El Niño 2026: धान की खेती वाले प्रमुख राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और तेलंगाना में किसानों को मौसम की अनिश्चितताओं को देखते हुए कम अवधि (Short Duration) वाली धान की किस्मों को प्राथमिकता देने की सलाह दी गई है। El Niño 2026

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी किस्में कम बारिश या मानसून में देरी की स्थिति में भी बेहतर उत्पादन देने में सक्षम होती हैं और फसल के नुकसान का जोखिम कम करती हैं। इसके साथ ही किसानों को स्थानीय कृषि वैज्ञानिकों की अनुशंसित किस्मों का चयन करने और समय पर बुवाई सुनिश्चित करने की भी सलाह दी गई है। El Niño 2026
वहीं, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख मक्का उत्पादक राज्यों में मक्का की बुवाई और फसल की स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। मौसम में संभावित बदलाव और वर्षा की स्थिति को देखते हुए कृषि विभाग राज्यों के साथ समन्वय बनाए हुए है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर किसानों को वैकल्पिक फसल, उन्नत बीज और अन्य तकनीकी सहायता समय पर उपलब्ध कराई जा सके। El Niño 2026
El Niño 2026
अल नीनो के प्रभाव के चलते इस साल मॉनसून के कमजोर रहने और कई क्षेत्रों में बारिश में देरी होने की आशंका जताई जा रही है। ऐसी स्थिति को देखते हुए देश की निजी बीज कंपनियों ने खरीफ सीजन के लिए सामान्य मांग की तुलना में 20 से 30 प्रतिशत अधिक बीज का भंडारण पहले से ही कर लिया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मौसम की अनिश्चितता के बावजूद किसानों को समय पर गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध हो सकें और बुवाई प्रभावित न हो। El Niño 2026

न्यूज एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (FSII) के अध्यक्ष अजय राणा ने बताया कि इस बार मक्का, धान और मोटे अनाज के बीजों का उत्पादन बेहतर रहा है, जिससे बाजार में पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है। हालांकि, उनके अनुसार सबसे बड़ी चुनौती बीजों की उपलब्धता नहीं, बल्कि उन्हें समय रहते कम वर्षा वाले और प्रभावित जिलों तक पहुंचाना है। यदि बीज समय पर किसानों तक पहुंच जाते हैं, तो बुवाई में देरी से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। El Niño 2026
उन्होंने यह भी बताया कि लगभग 1,000 किसानों पर किए गए एक सर्वेक्षण में 75 प्रतिशत किसानों ने खरीफ सीजन के लिए पहले ही बीज खरीद लिए हैं, जबकि शेष 25 प्रतिशत किसान मानसून की स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में कृषि विभाग, बीज कंपनियों और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय बेहद जरूरी होगा, ताकि जरूरत वाले क्षेत्रों में अतिरिक्त बीज समय पर उपलब्ध कराए जा सकें और खरीफ उत्पादन पर मौसम का असर कम से कम पड़े। El Niño 2026
20–30 प्रतिशत अतिरिक्त बीज स्टॉक से किसानों को मिलेगी राहत
हर साल बीज उद्योग मांग में संभावित उतार-चढ़ाव, बीज वापसी और दोबारा बुवाई जैसी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सामान्य आवश्यकता से लगभग 15 से 20 प्रतिशत अतिरिक्त बीज का स्टॉक तैयार रखता है। लेकिन इस बार बीज उत्पादन बेहतर रहने के कारण निजी कंपनियों और बीज उत्पादकों के पास 20 से 30 प्रतिशत तक अतिरिक्त बीज उपलब्ध हैं, जो खरीफ सीजन के दौरान किसानों के लिए बड़ी राहत साबित हो सकते हैं। El Niño 2026

फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (FSII) के अध्यक्ष अजय राणा के अनुसार, यदि कमजोर या देरी से आने वाले मॉनसून के कारण किसानों को दोबारा बुवाई (Re-sowing) करनी पड़ती है, तो सरकार और निजी कंपनियों के पास उपलब्ध अतिरिक्त बीज स्टॉक उनकी मांग को पूरा करने में अहम भूमिका निभाएगा। इससे किसानों को समय पर बीज मिलने में आसानी होगी और बुवाई का काम प्रभावित नहीं होगा। El Niño 2026
हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि इस समय सबसे बड़ी चुनौती बीजों की कमी नहीं, बल्कि उन्हें सही समय पर कम वर्षा वाले और प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचाना है। यदि बीजों की आपूर्ति समय पर सुनिश्चित की जाती है, तो मौसम की अनिश्चितताओं के बावजूद खरीफ फसलों की बुवाई और उत्पादन पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
सरकार के पास 1.92 करोड़ क्विंटल प्रमाणित बीज का भंडार
फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (FSII) के अध्यक्ष अजय राणा ने बताया कि बदलते मौसम और कम बारिश की आशंका को देखते हुए कम अवधि में तैयार होने वाली तथा जलवायु-अनुकूल बीज किस्मों का महत्व काफी बढ़ गया है। ऐसी किस्में विशेष रूप से उन जिलों के लिए लाभदायक हैं, जहां मानसून कमजोर रहने या बारिश में देरी की संभावना है, क्योंकि ये कम समय में बेहतर उत्पादन देने में सक्षम होती हैं। El Niño 2026
उन्होंने बताया कि खरीफ सीजन के लिए सरकार के पास वर्तमान में लगभग 1.92 करोड़ क्विंटल प्रमाणित बीज उपलब्ध हैं, जबकि अनुमानित आवश्यकता करीब 1.73 करोड़ क्विंटल है। इसका मतलब है कि मांग की तुलना में लगभग 11.2 प्रतिशत अधिक प्रमाणित बीज का स्टॉक पहले से मौजूद है। इसके अलावा निजी बीज कंपनियों ने भी सामान्य आवश्यकता से अधिक बीज का भंडारण किया है, ताकि जरूरत पड़ने पर प्रभावित क्षेत्रों में समय पर बीज उपलब्ध कराए जा सकें और किसानों को दोबारा बुवाई जैसी परिस्थितियों में किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े। El Niño 2026
मॉनसून में देरी से इन राज्यों के किसानों की बढ़ सकती है चिंता
कमजोर या देरी से आने वाले मॉनसून की आशंका को देखते हुए केंद्र सरकार ने देश के 12 राज्यों के 315 जिलों को ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों के रूप में चिन्हित किया है, जहां खरीफ फसलों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इन जिलों में बारिश की कमी या देरी के कारण बुवाई प्रभावित होने की संभावना है, इसलिए सरकार और कृषि विभाग लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।
फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (FSII) के अध्यक्ष अजय राणा ने बताया कि भारत की लगभग 50 प्रतिशत कृषि आज भी वर्षा पर निर्भर है। ऐसे में यदि अल नीनो के कारण मानसून कमजोर रहता है, तो इसका सीधा असर खरीफ फसलों की बुवाई और उत्पादन पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार के कई इलाकों में बारिश में देरी के कारण बुवाई की रफ्तार धीमी है, जबकि पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे सिंचित क्षेत्रों में पर्याप्त सिंचाई सुविधाएं होने के कारण इसका प्रभाव अपेक्षाकृत कम देखने को मिल रहा है। El Niño 2026
अजय राणा ने आगे कहा कि यदि जुलाई और अगस्त के दौरान भी मानसून सामान्य से कमजोर रहता है, तो किसानों को कम अवधि (Short Duration) में तैयार होने वाली, सूखा सहन करने वाली और अधिक उत्पादन देने वाली फसल किस्मों को अपनाना चाहिए। इसके साथ ही मौसम की स्थिति के अनुसार कृषि प्रबंधन में भी बदलाव करना जरूरी होगा। उन्होंने सलाह दी कि किसान धान सहित अन्य खरीफ फसलों में उर्वरकों का संतुलित एवं समय पर उपयोग करें, जल संरक्षण के उपाय अपनाएं और कृषि वैज्ञानिकों द्वारा जारी स्थानीय सलाह का पालन करें, ताकि मौसम की अनिश्चितताओं के बावजूद उत्पादन पर कम से कम असर पड़े। El Niño 2026
हाइब्रिड बीजों से कम समय में बेहतर उत्पादन की उम्मीद
फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (FSII) के अध्यक्ष अजय राणा ने कहा कि हाइब्रिड बीजों को लेकर किसानों के बीच कई गलत धारणाएं हैं। आमतौर पर माना जाता है कि हाइब्रिड किस्मों को अधिक पानी और ज्यादा उर्वरक की आवश्यकता होती है, जबकि वास्तविकता इससे अलग है। उनके अनुसार, आधुनिक हाइब्रिड बीज कम पानी और संतुलित उर्वरक के उपयोग के साथ भी बेहतर उत्पादन देने में सक्षम हैं। El Niño 2026
उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि पंजाब और हरियाणा में हाइब्रिड धान की खेती के लिए औसतन केवल 2 बोरी यूरिया की जरूरत पड़ती है, जबकि पारंपरिक धान की किस्मों में 3 से 4 बोरी यूरिया तक का उपयोग करना पड़ता है। इतना ही नहीं, हाइब्रिड धान की फसल सामान्य किस्मों की तुलना में करीब 15 दिन पहले तैयार हो जाती है, जिससे किसानों को समय की बचत के साथ अगली फसल की तैयारी के लिए भी अतिरिक्त समय मिल जाता है।
अजय राणा ने बताया कि बदलते मौसम, अनिश्चित मानसून और जलवायु परिवर्तन को देखते हुए देशभर के किसान अब कम और मध्यम अवधि में पकने वाली फसल किस्मों को तेजी से अपना रहे हैं। इसी बढ़ती मांग को ध्यान में रखते हुए बीज उद्योग ने ऐसे हाइब्रिड और जलवायु-अनुकूल बीजों का बड़े पैमाने पर उत्पादन और पर्याप्त भंडारण किया है, ताकि जरूरत पड़ने पर किसानों को समय पर गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराए जा सकें और खरीफ उत्पादन पर मौसम का असर कम किया जा सके।
किसानों को कम अवधि वाली धान की किस्में अपनाने की सलाह
मौसम में संभावित अनिश्चितता और कमजोर मानसून की आशंका को देखते हुए विशेषज्ञों ने धान उत्पादक राज्यों के किसानों को कम अवधि (Short Duration) में तैयार होने वाली धान की किस्मों की खेती करने की सलाह दी है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और तेलंगाना जैसे प्रमुख धान उत्पादक राज्यों में ऐसी किस्में अपनाने से बारिश में देरी या कम वर्षा की स्थिति में भी बेहतर उत्पादन मिलने की संभावना रहती है। साथ ही ये किस्में जल्दी पकने के कारण किसानों को अगली फसल की तैयारी के लिए भी पर्याप्त समय उपलब्ध कराती हैं।
इसके अलावा मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में मक्का की बुवाई और फसल की स्थिति पर भी लगातार निगरानी रखी जा रही है। यदि मानसून सामान्य से कमजोर रहता है, तो इन क्षेत्रों में कृषि विभाग किसानों को आवश्यक तकनीकी सलाह और वैकल्पिक फसल विकल्प उपलब्ध कराने की तैयारी कर रहा है।
एफएसआईआई के अध्यक्ष अजय राणा ने बताया कि ज्वार, बाजरा और अन्य मोटे अनाज (मिलेट्स) कम वर्षा की परिस्थितियों में भी अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करते हैं। ये फसलें कम पानी में अच्छी पैदावार देने के साथ जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना करने में भी सक्षम हैं। उन्होंने कहा कि इन फसलों के लिए पर्याप्त मात्रा में गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध हैं, इसलिए आवश्यकता पड़ने पर किसान इन्हें वैकल्पिक फसल के रूप में अपनाकर जोखिम कम कर सकते हैं।
