Carbon Farming: बेंगलुरु के कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों के लिए एक कम लागत वाली और पर्यावरण-अनुकूल बायोचार तकनीक विकसित की है, जो फसल अवशेषों (Crop Residues) को उपयोगी मिट्टी सुधारक (Soil Amendment) में बदलने का काम करती है। इस तकनीक की मदद से खेतों में मौजूद पराली और अन्य कृषि अवशेषों का बेहतर उपयोग किया जा सकता है, जिससे उन्हें जलाने की आवश्यकता भी कम होगी। Carbon Farming
Carbon Farming
वैज्ञानिकों के अनुसार, बायोचार के इस्तेमाल से मिट्टी में जैविक कार्बन (Organic Carbon) का स्तर बढ़ता है, मिट्टी की उर्वरता और जल धारण क्षमता में सुधार होता है तथा उर्वरकों की उपयोग दक्षता भी बढ़ती है। इससे किसानों की रासायनिक खाद पर निर्भरता और खेती की कुल लागत कम हो सकती है।खासतौर पर छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह तकनीक अधिक लाभदायक मानी जा रही है, क्योंकि कम निवेश में बेहतर उत्पादन और लंबे समय तक स्वस्थ मिट्टी बनाए रखने में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। Carbon Farming

किसानों की मिट्टी की सेहत सुधारने, उर्वरता बढ़ाने और खेती की लागत कम करने के उद्देश्य से कृषि वैज्ञानिकों ने एक कम लागत वाली बायोचार (Biochar) तकनीक विकसित की है। इस नवाचार को बेंगलुरु स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (UAS) और गांधी कृषि विज्ञान केंद्र (GKVK) के वैज्ञानिकों ने तैयार किया है। इस तकनीक की खास बात यह है कि बायोचार बनाने के लिए किसी भी बाहरी रसायन या अतिरिक्त सामग्री की जरूरत नहीं पड़ती। Carbon Farming
वैज्ञानिकों के अनुसार, बायोचार तैयार करने में अरहर, मक्का और शहतूत के डंठल, सूरजमुखी के अवशेषों के साथ-साथ अन्य फसलों की कटाई और छंटाई से निकलने वाले कृषि अवशेषों का उपयोग किया जाता है। इससे फसल अवशेषों का बेहतर प्रबंधन संभव होता है और उन्हें जलाने की आवश्यकता भी कम हो सकती है। Carbon Farming
विशेषज्ञों का मानना है कि बायोचार के नियमित उपयोग से मिट्टी में जैविक कार्बन और आवश्यक पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है, जल धारण क्षमता में सुधार होता है तथा रासायनिक उर्वरकों की उपयोग दक्षता भी बढ़ती है। इससे विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों की उत्पादकता बढ़ाने, मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने और खेती को अधिक टिकाऊ एवं किफायती बनाने में महत्वपूर्ण मदद मिल सकती है। Carbon Farming
कैसे काम करती है बायोचार तकनीक?
बेंगलुरु स्थित यूएएस के कुलपति एस.वी. सुरेशा के अनुसार, कर्नाटक की आधे से अधिक कृषि भूमि में मिट्टी का जैविक कार्बन (Soil Organic Carbon) आवश्यक स्तर से नीचे पहुंच चुका है, जिससे मिट्टी की उर्वरता और फसलों की उत्पादकता प्रभावित हो रही है। उन्होंने बताया कि इस चुनौती से निपटने के लिए विकसित की गई बायोचार तकनीक फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उन्हें मिट्टी के लिए उपयोगी संसाधन में बदलने का प्रभावी तरीका प्रदान करती है। Carbon Farming

वैज्ञानिकों ने इसके लिए 25 किलोग्राम क्षमता वाला एक विशेष धातु ड्रम तैयार किया है। इस ड्रम में छोटे-छोटे छेद बनाए गए हैं, ताकि अंदर सीमित मात्रा में ऑक्सीजन प्रवेश कर सके। बायोचार बनाने के लिए अरहर, मक्का, सूरजमुखी, शहतूत और अन्य फसलों के सूखे अवशेषों को ड्रम में भरकर उसका ढक्कन बंद कर दिया जाता है। Carbon Farming
इसके बाद ड्रम को लगभग तीन घंटे तक नियंत्रित तरीके से गर्म किया जाता है। सीमित ऑक्सीजन की मौजूदगी में अवशेष पूरी तरह जलने के बजाय कार्बन युक्त बायोचार में परिवर्तित हो जाते हैं। तैयार बायोचार को बाद में खेतों में मिलाया जाता है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने और जैविक कार्बन बढ़ाने में मदद मिलती है। Carbon Farming
कृषि भूमि में कितना होना चाहिए जैविक कार्बन?
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और लंबे समय तक बेहतर उत्पादन प्राप्त करने के लिए कृषि भूमि में पर्याप्त मात्रा में जैविक कार्बन (Soil Organic Carbon) होना बेहद जरूरी है। बायोचार इस कमी को दूर करने का एक प्रभावी माध्यम माना जा रहा है, क्योंकि इसमें कार्बन की मात्रा काफी अधिक होती है। Carbon Farming
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विशेषज्ञों के मुताबिक, एक किलोग्राम बायोचार में लगभग 500 से 800 ग्राम (50 से 80 प्रतिशत) तक कार्बन मौजूद होता है। यही कार्बन मिट्टी की संरचना को मजबूत बनाने, पोषक तत्वों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने, जल धारण क्षमता बढ़ाने और सूक्ष्मजीवों की सक्रियता में सुधार करने में मदद करता है। Carbon Farming
वैज्ञानिकों का कहना है कि राष्ट्रीय मानकों के अनुसार एक हेक्टेयर कृषि भूमि में कम से कम 0.75 प्रतिशत जैविक कार्बन होना चाहिए। हालांकि, वर्तमान में कर्नाटक सहित देश के कई राज्यों की कृषि भूमि में यह स्तर केवल 0.33 से 0.50 प्रतिशत के बीच दर्ज किया जा रहा है, जो आदर्श स्तर से काफी कम है। Carbon Farming
इसके विपरीत, वन क्षेत्रों के आसपास की मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा सामान्यतः 1 से 1.5 प्रतिशत तक पाई जाती है। ऐसे में बायोचार तकनीक मिट्टी में कार्बन की कमी दूर करने, उसकी उर्वरता बढ़ाने और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने का एक प्रभावी विकल्प साबित हो सकती है। Carbon Farming
मिट्टी में जैविक कार्बन की कमी क्यों बढ़ रही है?
वैज्ञानिकों के अनुसार, कर्नाटक का कोलार जिला मिट्टी में जैविक कार्बन (Soil Organic Carbon-SOC) की कमी से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल है। यहां की 94 प्रतिशत से अधिक कृषि भूमि में जैविक कार्बन का स्तर बेहद कम दर्ज किया गया है, जिससे मिट्टी की उर्वरता और फसलों की उत्पादकता पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मिट्टी में कार्बन की कमी के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। इनमें रासायनिक उर्वरकों का लगातार और अत्यधिक उपयोग, पशुधन की संख्या में कमी, गोबर की खाद की सीमित उपलब्धता और बढ़ती कीमतें, एक ही फसल की लगातार खेती (मोनोक्रॉपिंग) तथा फसल अवशेषों को खेतों में जलाने जैसी कृषि पद्धतियां प्रमुख हैं। इन कारणों से मिट्टी में जैविक पदार्थों की मात्रा लगातार घट रही है, जिससे उसकी गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता प्रभावित हो रही है।
उर्वरकों के आयात पर भारत की बड़ी निर्भरता
वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत आज भी रासायनिक उर्वरकों की जरूरत पूरी करने के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। देश अपनी कुल आवश्यकता का 20 से 25 प्रतिशत यूरिया, 50 से 60 प्रतिशत डीएपी (DAP) और लगभग 100 प्रतिशत म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) विदेशों से आयात करता है। यदि इन उर्वरकों के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख कच्चे माल, जैसे प्राकृतिक गैस, रॉक फॉस्फेट और सल्फर के आयात को भी शामिल किया जाए, तो भारत की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर निर्भरता 68 से 70 प्रतिशत तक पहुंच जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बायोचार जैसी कम लागत वाली तकनीकें मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ाकर उसकी उर्वरता सुधार सकती हैं। साथ ही, इससे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम होने की संभावना है, जिससे किसानों की उत्पादन लागत घटेगी और कृषि प्रणाली अधिक टिकाऊ एवं आत्मनिर्भर बन सकेगी।
निष्कर्ष
बायोचार तकनीक मिट्टी की घटती उर्वरता और जैविक कार्बन की कमी जैसी गंभीर समस्याओं का एक प्रभावी और कम लागत वाला समाधान बनकर उभर रही है। फसल अवशेषों का बेहतर उपयोग कर यह तकनीक न केवल मिट्टी की गुणवत्ता और जल धारण क्षमता में सुधार करती है, बल्कि रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता और खेती की लागत भी कम करने में मदद करती है।
यदि इस तकनीक को बड़े स्तर पर अपनाया जाता है, तो इससे छोटे और सीमांत किसानों की आय बढ़ाने, टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने और कृषि क्षेत्र को अधिक आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण योगदान मिल सकता है।
