Galghotu Aur Langda Bukhar Se Bachav: बरसात का मौसम किसानों और पशुपालकों के लिए हरियाली और चारे की उपलब्धता लेकर आता है, लेकिन यही मौसम पशुओं में कई गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ा देता है। विशेषकर गलघोंटू (एचएस) और लंगड़ी बुखार (ब्लैक क्वार्टर) जैसी बैक्टीरिया जनित बीमारियां मानसून के दौरान तेजी से फैलती हैं। गलघोंटू और लंगड़ी बुखार के बारे में सही जानकारी होना हर पशुपालक के लिए बेहद आवश्यक है, क्योंकि समय पर पहचान, टीकाकरण और उपचार न मिलने पर ये रोग 24 से 48 घंटे के भीतर पशु की जान भी ले सकते हैं। इससे पशुपालकों को आर्थिक नुकसान के साथ-साथ दूध उत्पादन में भी भारी गिरावट का सामना करना पड़ सकता है।
मानसून में क्यों बढ़ जाता है गलघोंटू और लंगड़ी बुखार का खतरा
बारिश के मौसम में खेतों और पशुशालाओं में नमी, कीचड़ और दूषित पानी की मात्रा बढ़ जाती है। यही वातावरण बैक्टीरिया के तेजी से पनपने और फैलने के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है। Galghotu Aur Langda Bukhar Se Bachav के लिए यह समझना आवश्यक है कि गलघोंटू रोग Pasteurella multocida जीवाणु से होता है, जबकि लंगड़ी बुखार Clostridium chauvoei बैक्टीरिया के कारण फैलता है। संक्रमित मिट्टी, गंदा पानी और अस्वच्छ पशुशाला इन रोगों के संक्रमण को कई गुना बढ़ा देते हैं।
विशेषज्ञों ने समय पर टीकाकरण को बताया सबसे बड़ा बचाव
सीधी जिले के पशु चिकित्साधिकारी डॉ. सलिल कुमार पाठक के अनुसार Galghotu Aur Langda Bukhar Se Bachav का सबसे प्रभावी तरीका मानसून शुरू होने से पहले कंबाइंड वैक्सीन लगवाना है। समय पर टीकाकरण कराने से पशुओं में इन जानलेवा बीमारियों का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है। यदि किसी पशु में बीमारी के शुरुआती लक्षण दिखाई दें तो उसे तुरंत अन्य स्वस्थ पशुओं से अलग कर पशु चिकित्सक से इलाज कराना चाहिए।
गलघोंटू रोग के प्रमुख लक्षण
Galghotu Aur Langda Bukhar Se Bachav के लिए गलघोंटू रोग के लक्षणों की पहचान करना बेहद आवश्यक है। इस बीमारी में पशु को तेज बुखार आता है, मुंह से लगातार लार टपकती रहती है और गले में दर्दनाक सूजन होने लगती है। सूजन बढ़ने पर पशु को सांस लेने में कठिनाई होती है तथा सांस लेते समय ‘घुर-घुर’ जैसी आवाज सुनाई देती है। यदि समय रहते उपचार नहीं कराया जाए तो दम घुटने के कारण पशु की मौत भी हो सकती है।
लंगड़ी बुखार की पहचान कैसे करें
Galghotu Aur Langda Bukhar Se Bachav के लिए लंगड़ी बुखार के संकेतों को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इस बीमारी में पशु के अगले या पिछले पैरों के पुट्ठों में सूजन आ जाती है। सूजन वाली जगह को दबाने पर ‘चर-चर’ जैसी आवाज आती है और पशु लंगड़ाकर चलने लगता है। संक्रमण बढ़ने पर पशु खाना-पीना छोड़ देता है और शरीर का तापमान 105 से 106 डिग्री फारेनहाइट तक पहुंच सकता है।
समय पर इलाज नहीं मिला तो 48 घंटे में हो सकती है मौत
पशु विशेषज्ञों के अनुसार Galghotu Aur Langda Bukhar Se Bachav के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात बीमारी की शुरुआती पहचान है। संक्रमण गंभीर होने पर गलघोंटू में पशु का दम घुट सकता है, जबकि लंगड़ी बुखार में शरीर में विषैले तत्व तेजी से फैल जाते हैं। ऐसी स्थिति में 24 से 48 घंटे के भीतर पशु की मृत्यु हो सकती है। यदि पशु बच भी जाए तो उसकी दुग्ध उत्पादन क्षमता स्थायी रूप से कम हो सकती है और उसकी शारीरिक क्षमता भी प्रभावित होती है।
बरसात में पशुओं की देखभाल कैसे करें
Galghotu Aur Langda Bukhar Se Bachav के लिए पशुशाला को हमेशा साफ, सूखा और हवादार रखना चाहिए। कीचड़ और गंदगी को नियमित रूप से हटाना जरूरी है ताकि बैक्टीरिया पनप न सकें। पशुओं को केवल साफ और ताजा पानी ही पिलाएं तथा गड्ढों, तालाबों या दूषित जल स्रोतों का पानी पीने से बचाएं। मच्छरों और मक्खियों से बचाव के लिए समय-समय पर कीटनाशकों का छिड़काव करें और आवश्यकता अनुसार नीम की पत्तियों का धुआं भी करें।
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संतुलित आहार से बढ़ती है रोग प्रतिरोधक क्षमता
Galghotu Aur Langda Bukhar Se Bachav में संतुलित पोषण की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पशुओं को केवल हरा चारा खिलाने के बजाय हरे और सूखे चारे का संतुलित मिश्रण दें। इसके साथ गुणवत्तापूर्ण पशु आहार और प्रतिदिन लगभग 50 ग्राम मिनरल मिक्सचर देने से रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है और दूध उत्पादन भी बेहतर बना रहता है।
दूध देने वाले पशुओं के थनों की सफाई भी जरूरी
बरसात के मौसम में थन संबंधी संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है। Galghotu Aur Langda Bukhar Se Bachav के साथ-साथ दूध निकालने के बाद थनों को पोटेशियम परमैंगनेट (लाल दवा) के घोल से साफ करना चाहिए। इससे बैक्टीरिया का संक्रमण कम होता है और पशु स्वस्थ रहते हैं।
समय पर सावधानी से बच सकती है पशुओं की जान
Galghotu Aur Langda Bukhar Se Bachav केवल टीकाकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि साफ-सफाई, संतुलित आहार, स्वच्छ पानी, नियमित निगरानी और शुरुआती लक्षणों की पहचान भी उतनी ही जरूरी है। यदि पशुपालक मानसून शुरू होने से पहले सभी आवश्यक सावधानियां अपनाएं और किसी भी असामान्य लक्षण पर तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें, तो गलघोंटू और लंगड़ी बुखार जैसी जानलेवा बीमारियों से पशुओं की सुरक्षा की जा सकती है। इससे पशुधन सुरक्षित रहेगा, दूध उत्पादन प्रभावित नहीं होगा और पशुपालकों को आर्थिक नुकसान से भी बचाया जा सकेगा।
