मार्च में तोरई की खेती कैसे करे , किसानों को मिल सकता है अच्छा मुनाफा, 50 दिनों में तैयार हो जाती है फसल March Me Torai Ki Kheti Kaise Kare, Kisano Ko Mil Sakta Hai Accha Munafa , 50 Dino ,Me Taiyar Ho Jaati Hai Fasal

मार्च में तोरई की खेती कैसे करे , किसानों को मिल सकता है अच्छा मुनाफा, 50 दिनों में तैयार हो जाती है फसल March Me Torai Ki Kheti Kaise Kare, Kisano Ko Mil Sakta Hai Accha Munafa , 50 Dino ,Me Taiyar Ho Jaati Hai Fasal
March Me Torai Ki Kheti Kaise Kare, Kisano Ko Mil Sakta Hai Accha Munafa

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March Me Torai Ki Kheti Kaise Kare, Kisano Ko Mil Sakta Hai Accha Munafa जल्दी तैयार होने वाली उन्नत किस्में

तोरई की कुछ किस्में ऐसी हैं जो बहुत जल्दी तैयार हो जाती हैं और किसानों को जल्दी उत्पादन देना शुरू कर देती हैं. भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित पूसा सुप्रिया ऐसी ही एक किस्म है. यह लगभग 50 दिनों में फल देना शुरू कर देती है और इससे करीब 130 से 140 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन मिल सकता है. इस किस्म में कई रोगों के प्रति सहनशीलता भी देखी जाती है.

इसी तरह पंत चिकनी तोरई-1 भी एक लोकप्रिय किस्म है, जिसे पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय ने विकसित किया है. इसके फल लंबे और आकर्षक होते हैं, जो बाजार में आसानी से बिक जाते हैं. यह किस्म लगभग 50 से 55 दिनों में तैयार हो जाती है और इससे करीब 140 से 170 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार मिल सकती है.

अधिक उत्पादन देने वाली किस्में

जो किसान ज्यादा उत्पादन चाहते हैं उनके लिए पूसा चिकनी किस्म एक अच्छा विकल्प मानी जाती है. यह फसल तैयार होने में लगभग 60 से 70 दिन का समय लेती है, लेकिन इसकी पैदावार काफी अच्छी होती है. इससे करीब 150 से 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन मिल सकता है.

किसानों में लोकप्रिय किस्म

कानपुर कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित कल्याणपुर हरी चिकनी को भी तोरई की अधिक उत्पादन देने वाली किस्मों में गिना जाता है. इसके फल अच्छी गुणवत्ता के होते हैं और बाजार में इसकी मांग भी अच्छी रहती है. इस किस्म से 200 से 220 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार मिलने की संभावना रहती है, इसलिए कई किसान इसकी खेती को प्राथमिकता देते हैं.

कम लागत में बेहतर आमदनी का मौका

तोरई की खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें लागत ज्यादा नहीं आती और फसल जल्दी तैयार हो जाती है. बाजार में इसकी मांग लगातार बनी रहती है, इसलिए किसानों को इसकी बिक्री में भी ज्यादा परेशानी नहीं होती.

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