Soyabin Ki Kheti Kese Kare सोयाबीन की खेती कैसे करें : जानें, सोयाबीन की उन्नत किस्में और बुवाई का तरीका

Soyabin Ki Kheti Kese Kare सोयाबीन की खेती कैसे करें : जानें, सोयाबीन की उन्नत किस्में और बुवाई का तरीका

Soyabin Ki Kheti Kese Kare सोयाबीन एक प्रमुख तिलहनी एवं दलहनी फसल है, जिसे “गोल्डन बीन” भी कहा जाता है। इसमें प्रोटीन और तेल की मात्रा अधिक होती है, इसलिए यह किसानों के लिए कम लागत में अच्छा मुनाफा देने वाली फसल मानी जाती है। Soyabin Ki Kheti Kese Kare

सोयाबीन की खेती अधिक हल्की, हल्की व रेतीली भूमि को छोड़कर सभी प्रकार की भूमि में सफलतापूर्वक की जा सकती है। परंतु पानी के निकास वाली चिकनी दोमट भूमि सोयाबीन के लिये अधिक उपयुक्त होती है। जिन खेतों में पानी रुकता हो, उनमें सोयाबीन न लें Soyabin Ki Kheti Kese Kare


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जानें सोयाबीन की उन्नत किस्में और बुवाई का सही तरीका

सोयाबीन की बुवाई आमतौर पर जून के पहले सप्ताह से शुरू हो जाती है। ऐसे में अच्छी और बंपर पैदावार पाने के लिए किसानों को इसकी उन्नत किस्मों और सही बुवाई तकनीक की जानकारी होना बेहद जरूरी है। सही समय पर बुवाई और बेहतर किस्मों का चयन करने से उत्पादन में काफी बढ़ोतरी होती है। Soyabin Ki Kheti Kese Kare

सोयाबीन एक प्रमुख तिलहनी फसल है, जिससे तेल के साथ-साथ सोया बड़ी, सोया दूध और सोया पनीर जैसे कई उत्पाद बनाए जाते हैं। बाजार में इसकी मांग अच्छी होने के कारण किसानों को इसका उचित मूल्य भी मिलता है, जिससे यह एक लाभकारी फसल बनती है।

भारत में सोयाबीन की खेती कई राज्यों में की जाती है, जिनमें मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान प्रमुख हैं। देश के कुल उत्पादन में मध्य प्रदेश का लगभग 45 प्रतिशत और महाराष्ट्र का करीब 40 प्रतिशत योगदान है। इसके अलावा बिहार जैसे राज्यों में भी इसकी खेती धीरे-धीरे बढ़ रही है।

भारत में सोयाबीन का उत्पादन लगभग 12 मिलियन टन के आसपास है और यह खरीफ सीजन की मुख्य फसल मानी जाती है। मध्य प्रदेश के इंदौर में स्थित सोयाबीन अनुसंधान केंद्र किसानों को नई किस्मों और तकनीकों की जानकारी उपलब्ध कराता है। Soyabin Ki Kheti Kese Kare

इस लेख के माध्यम से हम किसानों को सोयाबीन की खेती से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी सरल भाषा में उपलब्ध करा रहे हैं, ताकि वे बेहतर उत्पादन के साथ अधिक लाभ कमा सकें।

सोयाबीन की खेती का उचित समय

सोयाबीन मुख्य रूप से खरीफ सीजन की फसल है, इसलिए इसकी बुवाई मानसून के साथ करना सबसे उपयुक्त माना जाता है। इसकी बुवाई आमतौर पर जून के पहले सप्ताह से शुरू हो जाती है, लेकिन बेहतर अंकुरण और अच्छी पैदावार के लिए जून के तीसरे सप्ताह से लेकर जुलाई के मध्य तक का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। Soyabin Ki Kheti Kese Kare

सही समय पर बुवाई करने से फसल को पर्याप्त नमी और अनुकूल मौसम मिलता है, जिससे पौधों की वृद्धि बेहतर होती है और उत्पादन में वृद्धि होती है।

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सोयाबीन की खेती के लिए जलवायु व मिट्टी

सोयाबीन की खेती के लिए गर्म और हल्की नम जलवायु सबसे उपयुक्त मानी जाती है। इसके अच्छे विकास के लिए 26 से 32 डिग्री सेल्सियस तापमान आदर्श रहता है, जिससे पौधों की वृद्धि और उत्पादन बेहतर होता है। Soyabin Ki Kheti Kese Kare

मिट्टी की बात करें तो सोयाबीन के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट या काली मिट्टी सबसे उपयुक्त रहती है। जलभराव वाली भूमि में इसकी खेती से बचना चाहिए, क्योंकि इससे फसल को नुकसान हो सकता है। मिट्टी का pH मान 6.0 से 7.5 के बीच होना चाहिए, जिससे पौधों को पोषक तत्व आसानी से मिलते हैं और फसल स्वस्थ रहती है।

सोयाबीन की उन्नत किस्में

भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान द्वारा कई उन्नत किस्मों का विकास किया गया है, जिनमें एनआरसी 2 (अहिल्या 1), एनआरसी 12 (अहिल्या 2), एनआरसी 7 (अहिल्या 3) और एनआरसी 37 (अहिल्या 4) प्रमुख हैं। ये किस्में बेहतर उत्पादन और अनुकूलन क्षमता के लिए जानी जाती हैं। इसके अलावा जेएस 93-05, जेएस 95-60, जेएस 335, जेएस 80-21, पंजाब 1 और कलितुर जैसी किस्में भी किसानों के बीच काफी लोकप्रिय हैं, जिन्हें उच्च गुणवत्ता और बेहतर अंकुरण क्षमता (seed viability) के साथ विकसित किया गया है। Soyabin Ki Kheti Kese Kare

हाल के वर्षों में भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा एमएसीएस 1407 नामक एक नई उन्नत किस्म भी विकसित की गई है, जो अधिक उपज देने के साथ-साथ कीट प्रतिरोधी भी है। यह किस्म खासतौर पर असम, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पूर्वोत्तर राज्यों के लिए उपयुक्त मानी जाती है। इसकी बुवाई का उपयुक्त समय 20 जून से 5 जुलाई के बीच है।

एमएसीएस 1407 किस्म से लगभग 39 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है, जो अन्य किस्मों की तुलना में करीब 15–17 प्रतिशत अधिक है। इसके बीजों में लगभग 19–20 प्रतिशत तक तेल की मात्रा पाई जाती है, जिससे यह किसानों के लिए एक लाभकारी विकल्प बनती है। Soyabin Ki Kheti Kese Kare

सोयाबीन की खेती के लिए खेत की तैयारी

सोयाबीन की अच्छी पैदावार के लिए खेत की सही तैयारी बेहद जरूरी होती है। रबी फसल की कटाई के बाद खेत की गहरी जुताई रिवर्सिबल मोल्ड बोर्ड प्लाऊ या रिजिड टाइन कल्टीवेटर से करनी चाहिए, ताकि मिट्टी भुरभुरी बने और खरपतवार नष्ट हो जाएं। यह गहरी जुताई हर 2–3 साल में एक बार जरूर करनी चाहिए। Soyabin Ki Kheti Kese Kare

हर वर्ष बुवाई से पहले खेत को 2–3 बार जुताई कर अच्छी तरह तैयार करें और पाटा लगाकर समतल बना लें। खेत का समतलीकरण भी समय-समय पर करना जरूरी है, जिससे पानी का समान वितरण हो सके और जलभराव की समस्या न हो।

ग्रीष्मकालीन जुताई के बाद सोयाबीन की बुवाई करना अधिक लाभदायक रहता है। साथ ही फसल चक्र का पालन करना भी जरूरी है, यानी एक ही खेत में लगातार सोयाबीन की खेती नहीं करनी चाहिए।

बुवाई करते समय यह ध्यान रखें कि पर्याप्त नमी उपलब्ध हो। सामान्यतः लगभग 100 मिमी वर्षा होने के बाद ही बुवाई करना उपयुक्त माना जाता है। कम वर्षा की स्थिति में बुवाई करने से अंकुरण प्रभावित हो सकता है और फसल का विकास कमजोर रह सकता है। Soyabin Ki Kheti Kese Kare

बुवाई के लिए बीज व उसकी मात्रा

सोयाबीन की अच्छी पैदावार के लिए हमेशा प्रमाणित और उच्च गुणवत्ता वाले बीज का ही उपयोग करना चाहिए। यदि किसान अपने खेत का बचा हुआ बीज इस्तेमाल कर रहे हैं, तो उसे बुवाई से पहले उचित दवा से उपचारित करना जरूरी होता है, ताकि रोगों से बचाव हो सके। बाजार से बीज लेते समय विश्वसनीय स्रोत या सहकारी बीज भंडार से ही खरीदें और उसकी पक्की रसीद अवश्य लें। Soyabin Ki Kheti Kese Kare

बीज की मात्रा का निर्धारण दानों के आकार के अनुसार किया जाता है। खेत में लगभग 4 से 4.5 लाख पौधे प्रति हेक्टेयर रखना उचित माना जाता है। छोटे दाने वाली किस्मों के लिए 60–70 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज पर्याप्त होता है, जबकि बड़े दाने वाली किस्मों के लिए 80–90 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है। सही बीज दर अपनाने से अंकुरण अच्छा होता है और फसल का विकास बेहतर होता है। Soyabin Ki Kheti Kese Kare

सोयाबीन की बुवाई का तरीका/विधि

सोयाबीन की बुवाई हमेशा पंक्तियों में करनी चाहिए, जिससे फसल की देखभाल, निराई-गुड़ाई और प्रबंधन आसान हो जाता है। बेहतर परिणाम के लिए सीड ड्रिल मशीन से बुवाई करना उपयुक्त रहता है, क्योंकि इससे बीज और उर्वरक एक साथ समान रूप से डाले जा सकते हैं। Soyabin Ki Kheti Kese Kare

आधुनिक तकनीकों में फरो इरिगेटेड रेज्ड बेड (FIRB) और ब्रॉड बेड एंड फरो (BBF) पद्धति काफी लाभदायक मानी जाती हैं। इन विधियों में ऊंची क्यारियां (बेड) और उनके बीच गहरी व चौड़ी नालियां बनाई जाती हैं। इससे अधिक वर्षा की स्थिति में अतिरिक्त पानी आसानी से नालियों के जरिए बाहर निकल जाता है और फसल जलभराव से बची रहती है। वहीं कम वर्षा होने पर यही नालियां पानी को संचित करके पौधों को लगातार नमी प्रदान करती हैं।

इसके अलावा, इस पद्धति में पौधों को पर्याप्त धूप और हवा मिलती है, जिससे उनका विकास बेहतर होता है। पौधों को फैलने के लिए पर्याप्त जगह मिलती है, जिससे शाखाएं ज्यादा बनती हैं और फूल व फलियों की संख्या बढ़ती है। परिणामस्वरूप, उत्पादन में वृद्धि होती है और किसान को अधिक लाभ मिलता है। Soyabin Ki Kheti Kese Kare

कतारों में बुवाई की दूरी

सोयाबीन की बुवाई कतारों में करना सबसे बेहतर माना जाता है, जिससे पौधों को पर्याप्त जगह मिलती है और फसल प्रबंधन आसान रहता है। बुवाई सीड ड्रिल या हल के पीछे खूंट के माध्यम से की जा सकती है। सामान्यतः कतार से कतार की दूरी 45 से 65 सेंटीमीटर के बीच रखी जाती है, जो मिट्टी और किस्म के अनुसार तय होती है। Soyabin Ki Kheti Kese Kare

कम फैलने वाली किस्मों जैसे जेएस 93-05 और जेएस 95-60 के लिए कतार दूरी लगभग 40 सेंटीमीटर रखना उचित होता है। वहीं अधिक फैलने वाली किस्मों जैसे जेएस 335, एनआरसी 7 और जेएस 97-52 के लिए 45 सेंटीमीटर की दूरी बेहतर मानी जाती है।

पौधे से पौधे की दूरी 4 से 5 सेंटीमीटर के बीच रखनी चाहिए, ताकि पौधों का विकास संतुलित हो सके। बीज को 3 से 4 सेंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए, इससे अधिक गहराई पर बुवाई करने से अंकुरण प्रभावित हो सकता है। Soyabin Ki Kheti Kese Kare

सोयाबीन की फसल में खाद एवं उर्वरक प्रबंधन

सोयाबीन की अच्छी पैदावार के लिए खाद एवं उर्वरकों का उपयोग मिट्टी परीक्षण के आधार पर करना सबसे बेहतर रहता है। रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ जैविक खादों का भी उपयोग करना चाहिए, जैसे नाडेप खाद, गोबर खाद या अन्य कार्बनिक संसाधन 10–20 टन प्रति हेक्टेयर तथा वर्मी कम्पोस्ट लगभग 5 टन प्रति हेक्टेयर तक दिया जा सकता है। इससे मिट्टी की उर्वरता और संरचना में सुधार होता है।

संतुलित उर्वरक प्रबंधन के तहत नत्रजन, फॉस्फोरस, पोटाश और सल्फर की उचित मात्रा का उपयोग जरूरी है। सामान्यतः 20:60:40:20 (N:P:K:S) किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की मात्रा उपयुक्त मानी जाती है, जिसे अंतिम जुताई से पहले खेत में डालकर अच्छी तरह मिला देना चाहिए। Soyabin Ki Kheti Kese Kare

नत्रजन की अतिरिक्त पूर्ति के लिए आवश्यकता अनुसार लगभग 50 किलोग्राम यूरिया अंकुरण के 7–10 दिन बाद दिया जा सकता है। इसके अलावा सूक्ष्म पोषक तत्वों की पूर्ति के लिए जिंक सल्फेट लगभग 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मिट्टी परीक्षण के अनुसार देना लाभकारी रहता है। सही और संतुलित पोषण प्रबंधन से फसल का विकास बेहतर होता है और उत्पादन में वृद्धि होती है।

सोयाबीन में सिंचाई

सोयाबीन मुख्यतः खरीफ सीजन की वर्षा आधारित फसल है, इसलिए सामान्य परिस्थितियों में इसे अलग से सिंचाई की आवश्यकता बहुत कम होती है। फसल का विकास अधिकतर मानसूनी वर्षा पर ही निर्भर रहता है। Soyabin Ki Kheti Kese Kare

हालांकि, यदि फली बनने या भरने के समय लंबे समय तक सूखा पड़ जाए, तो एक हल्की सिंचाई देना फायदेमंद होता है, जिससे दानों का विकास अच्छा होता है और उपज पर सकारात्मक असर पड़ता है।

साथ ही यह ध्यान रखना बेहद जरूरी है कि खेत में पानी का जमाव न हो, क्योंकि जलभराव से पौधों की जड़ों को नुकसान होता है और फसल खराब हो सकती है। इसलिए खेत में उचित जल निकास की व्यवस्था होना जरूरी है। Soyabin Ki Kheti Kese Kare

सोयाबीन की कटाई

सोयाबीन की फसल पकने की अवधि उसकी किस्म पर निर्भर करती है, जो सामान्यतः लगभग 90 से 120 दिनों के बीच होती है। फसल के पकने पर पौधों की पत्तियां पीली होकर गिरने लगती हैं और फलियां सूखकर सख्त हो जाती हैं।

कटाई के समय बीजों में लगभग 12–15 प्रतिशत नमी होना उपयुक्त माना जाता है, ताकि दाने टूटें नहीं और उनकी गुणवत्ता बनी रहे। समय पर कटाई करना जरूरी है, क्योंकि देर होने पर फलियां फट सकती हैं और दाने गिरने का नुकसान हो सकता है।

सोयाबीन की प्राप्त उपज

सोयाबीन की उन्नत किस्मों और सही कृषि प्रबंधन के साथ किसान औसतन 18 से 35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। यह पैदावार मिट्टी, जलवायु और देखभाल के स्तर पर निर्भर करती है। Soyabin Ki Kheti Kese Kare

वहीं, नई उन्नत किस्म एमएसीएस 1407 से अनुकूल परिस्थितियों में लगभग 39 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज ली जा सकती है। इस किस्म में लगभग 19 प्रतिशत तक तेल की मात्रा पाई जाती है, जिससे यह किसानों के लिए अधिक लाभकारी साबित होती है।

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निष्कर्ष

सोयाबीन की खेती कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली फसल है, बशर्ते सही समय पर बुवाई, उन्नत किस्मों का चयन और संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाया जाए। अच्छी जल निकासी वाली भूमि, उचित दूरी पर बुवाई और जरूरत के अनुसार सिंचाई से फसल का विकास बेहतर होता है।

यदि किसान समय पर खरपतवार नियंत्रण, कीट-रोग प्रबंधन और सही अवस्था में कटाई करें, तो 18 से 35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर या उससे अधिक उत्पादन आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। सही तकनीक और प्रबंधन के साथ सोयाबीन की खेती किसानों के लिए एक लाभकारी विकल्प साबित होती है

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