खरीफ 2026 की शुरुआत Soyabin Farming के लिए उम्मीद के मुताबिक नहीं रही है। कृषि मंत्रालय के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार इस बार किसानों ने पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 31 लाख हेक्टेयर कम क्षेत्र में सोयाबीन की बुवाई की है। यह गिरावट केवल खेती के रकबे तक सीमित नहीं है
बल्कि इसका असर देश के खाद्य तेल उत्पादन, किसानों की आय, तेल उद्योग और आयात नीति पर भी पड़ सकता है। सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) ने भी चेतावनी दी है कि यदि आने वाले दिनों में बुवाई में तेजी नहीं आती है तो घरेलू खाद्य तेल उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
31 लाख हेक्टेयर कम हुई Soyabin Farming
कृषि मंत्रालय के 5 जुलाई 2026 तक जारी आंकड़ों के अनुसार इस बार Soyabin Farming का रकबा पिछले वर्ष की तुलना में काफी कम दर्ज किया गया है। वर्ष 2025 में इसी अवधि तक सोयाबीन का रकबा लगभग 78.80 लाख हेक्टेयर था, जबकि इस वर्ष यह घटकर 47.80 लाख हेक्टेयर रह गया है। यानी करीब 31 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में किसानों ने अभी तक सोयाबीन की बुवाई नहीं की है। इतनी बड़ी गिरावट खरीफ सीजन की सबसे महत्वपूर्ण कृषि चुनौतियों में गिनी जा रही है। यदि समय रहते बुवाई पूरी नहीं होती है तो इसका सीधा असर उत्पादन और बाजार दोनों पर देखने को मिलेगा।
मॉनसून की धीमी शुरुआत बनी सबसे बड़ी वजह
विशेषज्ञों का मानना है कि Soyabin Farming में आई गिरावट का सबसे बड़ा कारण मानसून की धीमी शुरुआत है। जून महीने में कई राज्यों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई, जिससे खेतों में पर्याप्त नमी नहीं बन पाई। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और अन्य प्रमुख सोयाबीन उत्पादक राज्यों में किसानों ने बारिश का इंतजार किया और कई स्थानों पर बुवाई में देरी हुई। हालांकि मौसम विभाग के अनुसार यदि जुलाई के दौरान अच्छी बारिश होती है तो किसानों को बुवाई का पर्याप्त अवसर मिलेगा और सोयाबीन के रकबे में सुधार होने की संभावना बनी हुई है।
कुल तिलहन क्षेत्र में भी आई बड़ी गिरावट
केवल Soyabin Farming ही नहीं, बल्कि पूरे तिलहन क्षेत्र में भी इस वर्ष गिरावट दर्ज की गई है। कृषि मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2025 में इसी अवधि तक कुल तिलहन का रकबा 109.27 लाख हेक्टेयर था, जबकि इस वर्ष यह घटकर 66.31 लाख हेक्टेयर रह गया है। इससे स्पष्ट है कि खरीफ सीजन की शुरुआत पिछले वर्ष की तुलना में काफी धीमी रही है। यदि आने वाले दिनों में बुवाई में तेजी नहीं आती है तो देश के कुल तिलहन उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है।
मूंगफली की खेती में भी आई बड़ी कमी
Soyabin Farming के साथ-साथ मूंगफली की खेती में भी उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। पिछले वर्ष मूंगफली का रकबा लगभग 28 लाख हेक्टेयर था, जबकि इस बार यह घटकर 16.93 लाख हेक्टेयर रह गया है। यानी करीब 11 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कम बुवाई हुई है। सोयाबीन और मूंगफली दोनों प्रमुख तिलहन फसलें हैं, इसलिए इनकी कम बुवाई खाद्य तेल उद्योग के लिए चिंता का विषय बन गई है।
सूरजमुखी और अरंडी से पूरी नहीं होगी कमी
हालांकि इस वर्ष सूरजमुखी और अरंडी (कैस्टर) की खेती में मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई है। सूरजमुखी का रकबा लगभग 33 हजार हेक्टेयर बढ़ा है, जबकि अरंडी का रकबा करीब 2 हजार हेक्टेयर बढ़ा है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि Soyabin Farming में आई 31 लाख हेक्टेयर की गिरावट की भरपाई केवल इन दोनों फसलों से संभव नहीं है। इनका उत्पादन देश की कुल खाद्य तेल आवश्यकता की तुलना में काफी कम है।
खाद्य तेल उत्पादन पर पड़ सकता है बड़ा असर
यदि Soyabin Farming का रकबा इसी तरह कम बना रहता है तो आने वाले महीनों में सोयाबीन उत्पादन घट सकता है। इससे घरेलू बाजार में सोयाबीन तेल की उपलब्धता कम होगी और खाद्य तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिल सकती है। खाद्य तेल उद्योग का मानना है कि कम उत्पादन होने पर तेल मिलों को कच्चे माल की कमी का सामना करना पड़ेगा, जिससे प्रोसेसिंग लागत भी बढ़ सकती है।
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खाद्य तेल आयात बढ़ने की आशंका
भारत पहले से ही अपनी खाद्य तेल जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। यदि Soyabin Farming में सुधार नहीं होता है और उत्पादन कम रहता है तो देश को अधिक मात्रा में खाद्य तेल आयात करना पड़ सकता है। इससे आयात बिल बढ़ेगा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों का असर घरेलू बाजार पर भी देखने को मिल सकता है। सरकार लंबे समय से खाद्य तेल के मामले में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में काम कर रही है, लेकिन कम बुवाई इस लक्ष्य के लिए चुनौती बन सकती है।
SEA ने क्या कहा?
सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) ने कहा है कि अभी उपलब्ध आंकड़े शुरुआती हैं और इन्हें अंतिम स्थिति नहीं माना जाना चाहिए। एसोसिएशन के अनुसार कई क्षेत्रों में बारिश की कमी के कारण Soyabin Farming की बुवाई में देरी हुई है। यदि आने वाले दिनों में मौसम अनुकूल रहता है तो किसानों के पास बुवाई पूरी करने का पर्याप्त अवसर रहेगा और रकबे में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिल सकता है। इसके साथ ही घरेलू तिलहन उत्पादन मजबूत होने की संभावना भी बनी रहेगी।
चावल, मक्का और दलहन की खेती भी हुई प्रभावित
इस बार खरीफ सीजन में केवल Soyabin Farming ही प्रभावित नहीं हुई है। कृषि मंत्रालय के अनुसार चावल का रकबा लगभग 9 लाख हेक्टेयर, मक्का का रकबा करीब 2 लाख हेक्टेयर और दलहन फसलों का क्षेत्रफल लगभग 10 लाख हेक्टेयर कम दर्ज किया गया है। इससे यह साफ होता है कि मानसून की धीमी शुरुआत का असर कई प्रमुख खरीफ फसलों पर पड़ा है।
आने वाले सप्ताह होंगे सबसे अहम
जुलाई के अगले दो से तीन सप्ताह Soyabin Farming के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। यदि प्रमुख उत्पादक राज्यों में सामान्य या उससे अधिक बारिश होती है तो सोयाबीन की बुवाई में तेजी आएगी। इससे रकबे में सुधार होगा, घरेलू तिलहन उत्पादन मजबूत होगा और खाद्य तेल उत्पादन को लेकर बनी चिंताओं में भी कमी आ सकती है।
सरकार, खाद्य तेल उद्योग और किसान सभी की नजर अब मॉनसून की प्रगति और खरीफ बुवाई के अगले चरण पर टिकी हुई है। आने वाले सप्ताह यह तय करेंगे कि इस वर्ष सोयाबीन उत्पादन कितना मजबूत रहेगा और देश की खाद्य तेल आपूर्ति पर इसका कितना प्रभाव पड़ेगा।
