Milk Production Decline: भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है और डेयरी सेक्टर करोड़ों किसानों की आजीविका का प्रमुख आधार माना जाता है। हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों का देश के कुल दूध उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान है।
लेकिन अब जलवायु परिवर्तन (Climate Change) इस मजबूत डेयरी व्यवस्था के सामने नई चुनौती बनकर उभर रहा है। हाल ही में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन ने संकेत दिया है कि बढ़ते तापमान और बदलते मौसम का सबसे अधिक असर हरियाणा की भैंसों पर दिखाई दे रहा है, जिससे Milk Production Decline की समस्या तेजी से सामने आ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ रही गर्मी, हीट स्ट्रेस, अनियमित बारिश और बदलती जलवायु दुधारू पशुओं की उत्पादकता को प्रभावित कर रही है। यदि यही स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो Milk Production Decline केवल डेयरी किसानों की आय तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश में दूध की उपलब्धता, डेयरी उद्योग की स्थिरता और उपभोक्ताओं के खर्च पर भी इसका सीधा असर पड़ सकता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक अब जलवायु परिवर्तन और डेयरी उत्पादन के संबंध पर गंभीरता से अध्ययन कर रहे हैं।
Milk Production Decline पर वैज्ञानिक अध्ययन में क्या सामने आया?
अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक जर्नल Scientific Reports में प्रकाशित शोध के अनुसार जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब स्पष्ट रूप से भारतीय डेयरी सेक्टर में दिखाई देने लगा है। अध्ययन में बताया गया है कि हरियाणा जैसे प्रमुख दूध उत्पादक राज्य में बढ़ते तापमान और मौसम में लगातार हो रहे बदलावों के कारण भैंसों के दूध उत्पादन में गिरावट दर्ज की जा रही है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि भैंसें गर्म मौसम के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं। जब तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है तो पशुओं के शरीर में हीट स्ट्रेस बढ़ने लगता है। इस स्थिति में पशु अपने शरीर का तापमान नियंत्रित करने के लिए अधिक ऊर्जा खर्च करते हैं, जिससे उनका चारा सेवन कम हो जाता है और दूध उत्पादन भी प्रभावित होने लगता है। इसी कारण अध्ययन में Milk Production Decline को जलवायु परिवर्तन से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में शामिल किया गया है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यदि तापमान में लगातार वृद्धि जारी रही तो आने वाले वर्षों में डेयरी उद्योग के लिए उत्पादन बनाए रखना पहले की तुलना में अधिक कठिन हो सकता है।
2004 से 2019 तक के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता
वैज्ञानिकों ने हरियाणा में वर्ष 2004 से 2019 तक के मौसम और दूध उत्पादन से जुड़े आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण किया। अध्ययन का उद्देश्य यह समझना था कि जलवायु परिवर्तन का दुधारू पशुओं की उत्पादकता पर कितना प्रभाव पड़ रहा है।
इस शोध में न्यूनतम तापमान, अधिकतम तापमान, औसत तापमान, तापमान-आर्द्रता सूचकांक (Temperature Humidity Index-THI), भारी वर्षा और वाष्पोत्सर्जन (Evapotranspiration) जैसे मौसम संबंधी कारकों का विश्लेषण किया गया। इसके साथ ही भैंस, देशी गाय और क्रॉसब्रीड गायों के दूध उत्पादन के रिकॉर्ड का भी अध्ययन किया गया।
अध्ययन के परिणामों से पता चला कि जैसे-जैसे तापमान बढ़ा, वैसे-वैसे Milk Production Decline का प्रभाव अधिक स्पष्ट होता गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि लगातार गर्म मौसम और बदलती जलवायु का सीधा असर दूध देने वाले पशुओं की क्षमता पर पड़ रहा है।
हरियाणा की भैंसें क्यों हो रही हैं सबसे ज्यादा प्रभावित?
हरियाणा लंबे समय से उच्च गुणवत्ता वाले भैंस के दूध के लिए जाना जाता है। राज्य की मुर्रा भैंस देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपनी अधिक दूध देने की क्षमता के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार यही नस्ल अधिक गर्मी के दौरान सबसे ज्यादा प्रभावित होती है।
भैंसों के शरीर में पसीने की ग्रंथियां (Sweat Glands) गायों की तुलना में कम सक्रिय होती हैं। यही कारण है कि अत्यधिक गर्मी में उनके शरीर का तापमान तेजी से बढ़ जाता है। जब पशु लंबे समय तक हीट स्ट्रेस का सामना करते हैं तो उनका भोजन कम हो जाता है, पानी की आवश्यकता बढ़ जाती है और दूध उत्पादन घटने लगता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि डेयरी फार्मों में पर्याप्त छाया, ठंडे पानी, वेंटिलेशन और कूलिंग सिस्टम की व्यवस्था नहीं होगी तो Milk Production Decline की स्थिति और गंभीर हो सकती है। यही वजह है कि आधुनिक डेयरी प्रबंधन को अब जलवायु परिवर्तन के अनुरूप विकसित करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
Milk Production Decline से डेयरी किसानों पर बढ़ रहा आर्थिक दबाव
हरियाणा के लाखों किसान खेती के साथ-साथ डेयरी व्यवसाय से भी अपनी आय अर्जित करते हैं। कई ग्रामीण परिवारों की नियमित कमाई का सबसे बड़ा स्रोत दूध बिक्री ही है। ऐसे में यदि दूध उत्पादन लगातार घटता है तो किसानों की मासिक आय पर सीधा असर पड़ना तय है।
विशेषज्ञों का कहना है कि दूध उत्पादन कम होने के बावजूद पशुओं के चारे, दवाइयों, बिजली, श्रम और रखरखाव का खर्च लगातार बढ़ रहा है। इससे डेयरी व्यवसाय की लाभप्रदता प्रभावित हो सकती है। यदि Milk Production Decline की स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो छोटे और मध्यम डेयरी किसानों के लिए आर्थिक चुनौतियां और बढ़ सकती हैं।
इसके अलावा दूध उत्पादन घटने से डेयरी उद्योग की सप्लाई चेन पर भी असर पड़ सकता है। दूध की उपलब्धता कम होने की स्थिति में प्रोसेसिंग कंपनियों, डेयरी सहकारी समितियों और स्थानीय बाजारों को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
दूध की कीमतों और उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जलवायु परिवर्तन के कारण Milk Production Decline लगातार बढ़ता रहा तो भविष्य में दूध और दुग्ध उत्पादों की कीमतों पर भी इसका असर दिखाई दे सकता है। जब उत्पादन कम होगा और मांग सामान्य या अधिक बनी रहेगी, तब बाजार में दूध की कीमतों में वृद्धि होना स्वाभाविक है।
भारत में दूध केवल एक खाद्य उत्पाद नहीं बल्कि करोड़ों परिवारों के दैनिक पोषण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं के लिए दूध आवश्यक पोषक तत्वों का प्रमुख स्रोत माना जाता है। इसलिए दूध उत्पादन में गिरावट का प्रभाव केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे डेयरी इकोसिस्टम और उपभोक्ताओं पर भी दिखाई देगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को देखते हुए अब डेयरी सेक्टर को अधिक टिकाऊ (Sustainable) और जलवायु-अनुकूल बनाने की आवश्यकता है। इससे भविष्य में Milk Production Decline जैसी समस्याओं को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
Milk Production Decline के बीच हरियाणा में बढ़ रही है देशी गायों की संख्या
जलवायु परिवर्तन और Milk Production Decline की बढ़ती चिंता के बीच हरियाणा से एक सकारात्मक तस्वीर भी सामने आई है। राज्य में देशी और अवर्गीकृत गायों की संख्या लगातार बढ़ रही है। केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह (ललन सिंह) ने राज्यसभा में जानकारी दी थी कि 19वीं और 20वीं पशुधन जनगणना के बीच हरियाणा में देशी एवं अवर्गीकृत मवेशियों की संख्या 8,12,013 से बढ़कर 9,49,541 हो गई है। यानी राज्य में लगभग 16.94 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि देशी नस्लों के संरक्षण और बेहतर प्रबंधन से डेयरी सेक्टर को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से कुछ हद तक सुरक्षित रखा जा सकता है। हालांकि, भैंसों की उत्पादकता में आ रही गिरावट को देखते हुए Milk Production Decline की चुनौती अभी भी बनी हुई है।
Milk Production Decline को कम करने में राष्ट्रीय गोकुल मिशन की भूमिका
देश में दुधारू पशुओं की नस्ल सुधार और दूध उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार राष्ट्रीय गोकुल मिशन चला रही है। हरियाणा भी इस योजना का प्रमुख लाभार्थी राज्य है। सरकार ने राज्य को अब तक 113.60 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता उपलब्ध कराई है।
इस राशि का उपयोग देशी नस्लों के संरक्षण, उच्च गुणवत्ता वाले प्रजनन कार्यक्रम, आधुनिक डेयरी ढांचे के विकास और दूध उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए किया जा रहा है। सरकार का उद्देश्य ऐसे पशुओं का विकास करना है जो बदलती जलवायु परिस्थितियों में भी बेहतर प्रदर्शन कर सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन होता है तो भविष्य में Milk Production Decline के असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रम से मिल रहा डेयरी किसानों को लाभ
राष्ट्रीय गोकुल मिशन के अंतर्गत राष्ट्रव्यापी कृत्रिम गर्भाधान (Artificial Insemination) कार्यक्रम भी तेजी से चलाया जा रहा है। इसका उद्देश्य किसानों को उनके गांव के पास ही बेहतर गुणवत्ता वाली प्रजनन सेवाएं उपलब्ध कराना है, ताकि उच्च उत्पादकता वाली नस्लों का विकास किया जा सके।
सरकार के अनुसार हरियाणा में अब तक 9.41 लाख कृत्रिम गर्भाधान किए जा चुके हैं। इससे 6.36 लाख पशुओं को लाभ मिला है और लगभग 4.7 लाख किसान इस योजना से लाभान्वित हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर आनुवंशिक क्षमता वाले पशु भविष्य में जलवायु परिवर्तन का सामना अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से कर सकते हैं, जिससे Milk Production Decline की समस्या को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
जलवायु परिवर्तन से डेयरी सेक्टर के सामने बढ़ रही नई चुनौतियां
भारत का डेयरी उद्योग केवल किसानों की आय का साधन नहीं है, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा और पोषण व्यवस्था का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन लगातार बढ़ता तापमान, लंबे समय तक चलने वाली गर्मी, अनियमित मानसून और बढ़ती आर्द्रता पशुपालन के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि हीट स्ट्रेस के कारण पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी प्रभावित होती है। इससे दूध उत्पादन के साथ-साथ प्रजनन क्षमता और पशुओं के स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है। यदि जलवायु परिवर्तन की गति इसी प्रकार बनी रही तो Milk Production Decline का प्रभाव आने वाले वर्षों में और अधिक व्यापक हो सकता है।
डेयरी किसानों को बदलनी होगी पशुपालन की रणनीति
विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते मौसम के अनुसार डेयरी किसानों को अपने पशुपालन प्रबंधन में भी बदलाव करना होगा। आधुनिक डेयरी फार्मों में वेंटिलेशन, फॉगिंग सिस्टम, कूलिंग पैड, पर्याप्त छाया और स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था अब पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
इसके साथ ही संतुलित पोषण, खनिज मिश्रण, नियमित स्वास्थ्य जांच और समय पर टीकाकरण जैसी व्यवस्थाएं भी दूध उत्पादन को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि आधुनिक तकनीकों को तेजी से अपनाया गया तो Milk Production Decline के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
सरकार और वैज्ञानिकों की संयुक्त पहल क्यों है जरूरी?
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौती से केवल किसान अकेले नहीं निपट सकते। इसके लिए सरकार, कृषि विश्वविद्यालयों, पशुपालन विभाग और डेयरी वैज्ञानिकों को मिलकर काम करना होगा। जलवायु अनुकूल नस्लों का विकास, पशुओं के लिए आधुनिक आवास, बेहतर चारा प्रबंधन और तकनीकी प्रशिक्षण जैसे कदम भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे।
यदि इन क्षेत्रों में तेजी से निवेश किया जाता है तो डेयरी उद्योग को अधिक मजबूत और टिकाऊ बनाया जा सकता है। साथ ही Milk Production Decline जैसी समस्या के आर्थिक प्रभाव को भी काफी हद तक कम किया जा सकेगा।
