Green Fodder Silage: बरसात में हरा चारा खिलाने से पहले जान लें ये जरूरी बातें, नहीं तो घट सकती है दूध की गुणवत्ता

Green Fodder Silage: बरसात में हरा चारा खिलाने से पहले जान लें ये जरूरी बातें, नहीं तो घट सकती है दूध की गुणवत्ता

Green Fodder Silage: बरसात का मौसम आते ही खेतों में हरियाली छा जाती है और पशुओं के लिए हरे चारे की उपलब्धता बढ़ जाती है। ऐसे समय में अधिकांश पशुपालक अपने पशुओं को भरपूर हरा चारा खिलाना शुरू कर देते हैं। हालांकि डेयरी विशेषज्ञों का कहना है कि मॉनसून के दौरान उगा हरा चारा सीधे पशुओं को खिलाना हमेशा सुरक्षित नहीं माना जाता।

Green Fodder Silage जैसी वैज्ञानिक चारा प्रबंधन तकनीक अपनाने से पशुओं को बेहतर पोषण मिलता है और उनका स्वास्थ्य भी सुरक्षित रहता है। बरसात में हरे चारे में अत्यधिक नमी होने के कारण उसमें संक्रमण फैलाने वाले जीवाणु और फफूंद तेजी से विकसित हो सकते हैं, जिससे पशुओं में डायरिया, पेट फूलना और पाचन संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।

Green Fodder Silage के साथ सूखा चारा देना क्यों जरूरी है?

डेयरी विशेषज्ञों के अनुसार मॉनसून के दौरान हरे चारे में पानी की मात्रा सामान्य दिनों की तुलना में काफी अधिक होती है। यदि पशु केवल हरा चारा ही खाते हैं तो उनके पाचन तंत्र पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और भोजन सही तरीके से पच नहीं पाता। ऐसी स्थिति में हरे चारे के साथ पर्याप्त मात्रा में सूखा चारा देना बेहद जरूरी हो जाता है। सूखा चारा हरे चारे की अतिरिक्त नमी को संतुलित करता है, जिससे रूमेन का कार्य सामान्य बना रहता है और पशु का पाचन बेहतर होता है। यही कारण है कि Green Fodder Silage के साथ संतुलित मात्रा में सूखा चारा शामिल करने की सलाह दी जाती है।

मिनरल्स की कमी से प्रभावित हो सकती है दूध की गुणवत्ता

बरसात के मौसम में केवल हरा चारा खिलाना पर्याप्त नहीं होता। पशुओं को आवश्यक मिनरल्स, खनिज मिश्रण, खल, बिनौला और चने की चूनी जैसी पोषक सामग्री भी नियमित रूप से दी जानी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पशुओं के आहार में मिनरल्स की कमी हो जाए तो दूध की गुणवत्ता, फैट प्रतिशत और उत्पादन पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। वहीं संतुलित मिनरल्स देने से पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत रहती है और दूध की गुणवत्ता भी बेहतर बनी रहती है।

Green Fodder Silage बनाकर पूरे साल सुरक्षित रखा जा सकता है हरा चारा

मॉनसून के दौरान खेतों में उपलब्ध अतिरिक्त हरे चारे को Green Fodder Silage बनाकर लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। यह तरीका डेयरी पशुपालकों के लिए बेहद लाभदायक माना जाता है क्योंकि इससे आने वाले सूखे मौसम में भी पौष्टिक चारे की उपलब्धता बनी रहती है। बरसीम, ओट और चरी जैसी पतले तने वाली चारा फसलें साइलेज बनाने के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती हैं। इन फसलों को सही समय पर काटकर वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित किया जाए तो उनकी पौष्टिकता लंबे समय तक बनी रहती है।

हरा चारा सुखाने का सही तरीका क्या है?

फोडर वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि हरे चारे को सुखाकर स्टोर करना हो तो उसे कभी भी सीधे जमीन पर नहीं फैलाना चाहिए। जमीन पर सुखाने से मिट्टी और नमी के कारण चारे में फफूंद लगने की संभावना बढ़ जाती है। बेहतर होगा कि चारे को जाली, लकड़ी के प्लेटफॉर्म या किसी ऊंचे स्थान पर फैलाकर सुखाया जाए। चाहें तो उसे रस्सी पर लटकाकर भी सुखाया जा सकता है ताकि हवा का अच्छा प्रवाह बना रहे और चारा जल्दी सूख जाए।

स्टोर करने से पहले नमी का स्तर जांचना जरूरी है

विशेषज्ञों के अनुसार जब चारे में लगभग 15 से 18 प्रतिशत नमी रह जाए और उसका तना आसानी से टूटने लगे, तब उसे सुरक्षित स्थान पर संग्रहित किया जा सकता है। यदि अधिक नमी वाला चारा स्टोर कर दिया जाए तो उसमें फफूंद लगने का खतरा बढ़ जाता है। ऐसा चारा पशुओं के लिए नुकसानदायक होता है और उसे खाने से पशु बीमार भी पड़ सकते हैं। इसलिए Green Fodder Silage तैयार करते समय नमी का सही स्तर बनाए रखना अत्यंत आवश्यक माना जाता है।

बरसात में पशुओं को हरा चारा खिलाते समय किन बातों का रखें ध्यान?

बरसात के मौसम में पशुपालकों को हरा चारा सीधे खेत से काटकर तुरंत नहीं खिलाना चाहिए। यदि संभव हो तो चारे को कुछ समय तक हल्का सुखाने के बाद ही पशुओं को देना चाहिए। हरे चारे के साथ पर्याप्त मात्रा में सूखा चारा और मिनरल्स अवश्य शामिल करें ताकि पशुओं का पाचन संतुलित बना रहे। साथ ही फफूंद लगा, सड़ा हुआ या बदबूदार चारा कभी भी पशुओं को नहीं खिलाना चाहिए। यदि अतिरिक्त हरा चारा उपलब्ध हो तो उसे Green Fodder Silage बनाकर सुरक्षित रखना भविष्य के लिए एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है।

Green Fodder Silage अपनाने से क्या होंगे फायदे?

यदि पशुपालक बरसात के मौसम में Green Fodder Silage तकनीक के साथ संतुलित आहार अपनाते हैं तो पशुओं का स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है। इससे पाचन संबंधी बीमारियों का खतरा कम होता है, दूध की गुणवत्ता और फैट प्रतिशत में सुधार होता है तथा पूरे वर्ष पौष्टिक चारे की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकती है। सही चारा प्रबंधन न केवल पशुओं की उत्पादकता बढ़ाता है बल्कि डेयरी व्यवसाय की आय बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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