देशभर में इस साल मॉनसून की धीमी शुरुआत का असर सीधे Crop Sowing पर दिखाई दिया है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के 5 जुलाई 2026 तक जारी आंकड़ों के अनुसार खरीफ फसलों का कुल रकबा पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 92 लाख हेक्टेयर कम रहा है। जून महीने में सामान्य से करीब 33 प्रतिशत कम बारिश होने के कारण खेतों में पर्याप्त नमी नहीं बन सकी, जिससे कई राज्यों में किसानों को समय पर बुवाई शुरू करने में कठिनाई हुई।
जुलाई के शुरुआती दिनों में बारिश की गतिविधियां बढ़ने से राहत की उम्मीद जरूर जगी है, लेकिन कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि देर से शुरू हुई Crop Sowing कई फसलों की उत्पादकता को प्रभावित कर सकती है।
कमजोर मॉनसून ने क्यों प्रभावित की Crop Sowing?
खरीफ सीजन की शुरुआत में अच्छी बारिश नहीं होने से खेतों में नमी की भारी कमी रही। कई इलाकों में किसान बीज होने के बावजूद बुवाई नहीं कर सके। सबसे अधिक असर धान, सोयाबीन, दालें, बाजरा और कपास जैसी प्रमुख खरीफ फसलों पर पड़ा। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जुलाई और अगस्त में सामान्य से अच्छी बारिश होती है तो Crop Sowing की रफ्तार में सुधार आ सकता है, लेकिन शुरुआती देरी की भरपाई पूरी तरह आसान नहीं होगी।
क्या महंगी हो सकती है आम आदमी की थाली?
मौसम वैज्ञानिक इस वर्ष अल नीनो के संभावित प्रभाव को लेकर भी चिंता जता रहे हैं। यदि आने वाले दिनों में बारिश सामान्य स्तर तक नहीं पहुंचती और Crop Sowing की गति धीमी बनी रहती है, तो खरीफ उत्पादन प्रभावित हो सकता है। ऐसे में चावल, दाल, खाद्य तेल और अन्य आवश्यक कृषि उत्पादों की आपूर्ति कम होने से कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना बढ़ सकती है। इसका असर केवल किसानों पर ही नहीं बल्कि हर आम परिवार के घरेलू बजट पर भी पड़ सकता है।
धान की बुवाई में 9 लाख हेक्टेयर से ज्यादा की कमी
कृषि मंत्रालय के अनुसार 5 जुलाई 2026 तक देश में धान की रोपाई 60.24 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 69.30 लाख हेक्टेयर थी। यानी इस बार धान का रकबा 9.06 लाख हेक्टेयर कम रहा। हालांकि खरीफ सीजन अभी जारी है और यदि बारिश लगातार होती रही तो धान की Crop Sowing में आने वाले दिनों में सुधार देखने को मिल सकता है।
दालों की खेती भी रही पीछे
दालों की बुवाई भी पिछले वर्ष की तुलना में कमजोर रही है। इस साल 5 जुलाई तक 37.15 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में दालों की खेती हुई, जबकि पिछले वर्ष यह आंकड़ा 47.49 लाख हेक्टेयर था। अरहर का रकबा 21 लाख हेक्टेयर से घटकर 12.35 लाख हेक्टेयर रह गया।
उड़द की खेती 4.63 लाख हेक्टेयर से घटकर 3.01 लाख हेक्टेयर और मूंग का क्षेत्रफल 17.20 लाख हेक्टेयर से घटकर 16.81 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया। केवल मोठ की खेती में मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई। इससे स्पष्ट है कि इस बार Crop Sowing का असर दाल उत्पादन पर भी पड़ सकता है।
मोटे अनाज की खेती भी रही सुस्त
श्री अन्न यानी मोटे अनाजों की बुवाई में भी गिरावट दर्ज की गई है। इस वर्ष 60.12 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में मोटे अनाज की खेती हुई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 71.86 लाख हेक्टेयर थी। बाजरा का रकबा लगभग 30 लाख हेक्टेयर से घटकर 20.82 लाख हेक्टेयर रह गया। वहीं मक्का की खेती भी 35 लाख हेक्टेयर से घटकर 32.94 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गई। इससे साफ है कि कमजोर बारिश ने Crop Sowing की रफ्तार को कई फसलों में प्रभावित किया।
तिलहन फसलों में सबसे ज्यादा गिरावट
इस साल तिलहन फसलों की बुवाई में सबसे बड़ी कमी दर्ज की गई है। कुल तिलहन क्षेत्र 109.27 लाख हेक्टेयर से घटकर 66.31 लाख हेक्टेयर रह गया। सबसे अधिक गिरावट सोयाबीन में देखने को मिली, जहां रकबा 79.20 लाख हेक्टेयर से घटकर 47.80 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया। मूंगफली का क्षेत्रफल भी 28 लाख हेक्टेयर से घटकर 16.93 लाख हेक्टेयर रह गया। हालांकि सूरजमुखी और अरंडी की बुवाई में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई। आंकड़े बताते हैं कि इस बार Crop Sowing का सबसे अधिक असर तिलहन क्षेत्र पर पड़ा है।
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कपास की खेती भी रही प्रभावित
कमजोर मॉनसून का असर कपास की खेती पर भी साफ दिखाई दिया। इस वर्ष 63.18 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुवाई हुई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 82 लाख हेक्टेयर थी। यानी करीब 18.82 लाख हेक्टेयर की गिरावट दर्ज की गई। यदि बारिश में और देरी होती है तो कपास उत्पादन पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।
गन्ना और जूट की खेती में मिली राहत
जहां अधिकांश खरीफ फसलों का रकबा कम हुआ है, वहीं गन्ने की खेती में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस वर्ष गन्ने का क्षेत्रफल 56.72 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 57.58 लाख हेक्टेयर पहुंच गया। इसी तरह जूट और मेस्टा का रकबा भी 6.16 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 6.28 लाख हेक्टेयर हो गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि सभी फसलों पर मॉनसून की सुस्ती का प्रभाव एक जैसा नहीं रहा।
आगे किसानों के लिए क्या हैं चुनौतियां?
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जुलाई और अगस्त में अच्छी बारिश होती है तो कई राज्यों में देर से बुवाई संभव है। हालांकि देर से होने वाली Crop Sowing के कारण फसलों की वृद्धि अवधि कम हो सकती है, जिससे पैदावार प्रभावित होने का खतरा बना रहेगा। ऐसे में किसानों को कम अवधि वाली किस्मों का चयन, खेतों में नमी संरक्षण और कृषि विभाग की सलाह के अनुसार फसल प्रबंधन अपनाने की आवश्यकता होगी।
