मानसून के दौरान लगातार बारिश, अधिक नमी और बदलते मौसम के कारण Aloo me Late Blight Rog का खतरा तेजी से बढ़ जाता है। इसी को देखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (ICAR-CPRI), शिमला ने आलू किसानों के लिए विशेष चेतावनी जारी की है। संस्थान के अनुसार वर्तमान मौसम Aloo me Late Blight Rog के फैलने के लिए बेहद अनुकूल है और यदि समय रहते रोकथाम नहीं की गई तो यह बीमारी आलू की फसल को 30 से 50 प्रतिशत तक नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए किसानों को फसल की नियमित निगरानी करने और शुरुआती लक्षण दिखते ही तुरंत उपचार शुरू करने की सलाह दी गई है।
क्या है Aloo me Late Blight Rog और क्यों है इतना खतरनाक?
Aloo me Late Blight Rog फाइटोफ्थोरा इन्फेस्टेंस (Phytophthora infestans) नामक फफूंद के कारण होने वाली एक गंभीर बीमारी है। यह रोग सबसे पहले आलू की पत्तियों पर हमला करता है और धीरे-धीरे तनों तथा कंदों तक पहुंच जाता है। यदि मौसम लगातार नम बना रहे और समय पर नियंत्रण नहीं किया जाए तो यह बीमारी पूरे खेत में बहुत तेजी से फैल जाती है। यही कारण है कि इसे आलू की सबसे खतरनाक बीमारियों में गिना जाता है।
ICAR-CPRI ने क्यों जारी किया अलर्ट?
ICAR-CPRI द्वारा विकसित इंडो-ब्लाइटकास्ट (Indo-Blightcast) पूर्वानुमान मॉडल के अनुसार वर्तमान मौसम Aloo me Late Blight Rog के प्रकोप के लिए अत्यधिक अनुकूल है। लगातार बारिश, बादल छाए रहने और अधिक आर्द्रता के कारण आने वाले दिनों में इस बीमारी के फैलने की संभावना और बढ़ सकती है। संस्थान ने किसानों से कहा है कि वे खेतों का नियमित निरीक्षण करें और बीमारी के शुरुआती संकेत मिलते ही कृषि विशेषज्ञों से संपर्क करें।
Aloo me Late Blight Rog के शुरुआती लक्षण कैसे पहचानें?
Aloo me Late Blight Rog की शुरुआत आमतौर पर पत्तियों पर गहरे हरे या पानी से भीगे हुए धब्बों के रूप में होती है। कुछ समय बाद यही धब्बे भूरे और फिर काले रंग के हो जाते हैं। रोग बढ़ने पर तनों पर भी काले धब्बे दिखाई देने लगते हैं। यदि संक्रमण अधिक बढ़ जाए तो आलू के कंद लाल-भूरे रंग के होकर सड़ने लगते हैं। ऐसे लक्षण दिखाई देने पर किसान बिना देरी किए रोग नियंत्रण के उपाय अपनाएं, क्योंकि यह बीमारी बहुत कम समय में पूरे खेत में फैल सकती है।
रोग से बचाव के लिए क्या करें किसान?
यदि खेत में अभी तक Aloo me Late Blight Rog के लक्षण दिखाई नहीं दिए हैं, तब भी किसानों को बचाव के उपाय अपनाने चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार मैनकोजेब (Mancozeb) या क्लोरोथालोनिल (Chlorothalonil) युक्त फफूंदनाशकों का समय पर छिड़काव करने से रोग का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है। प्रति हेक्टेयर लगभग 2 से 2.5 किलोग्राम दवा को 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है। समय पर किया गया यह छिड़काव Aloo me Late Blight Rog से फसल की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
रोग दिखाई देने पर तुरंत अपनाएं यह उपचार
यदि खेत में Aloo me Late Blight Rog के शुरुआती लक्षण दिखाई देने लगें तो किसानों को तुरंत प्रभावी फफूंदनाशकों का उपयोग करना चाहिए। कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार डाइमेथोमॉर्फ + अमेटोक्ट्राडिन, डाइमेथोमॉर्फ + मैनकोजेब, फ्लुओपिकोलाइड + प्रोपामोकार्ब या एजोक्सीस्ट्रोबिन + टेबुकोनाजोल जैसे फफूंदनाशकों का निर्धारित मात्रा में छिड़काव किया जा सकता है। सही समय पर उपचार करने से Aloo me Late Blight Rog के फैलाव को काफी हद तक रोका जा सकता है।
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फफूंदनाशक का छिड़काव कितने अंतराल पर करें?
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में Aloo me Late Blight Rog से बचाव के लिए हर 10 दिन के अंतराल पर फफूंदनाशक का छिड़काव किया जा सकता है। यदि मौसम लगातार नम बना रहे या रोग तेजी से फैलने लगे तो छिड़काव का अंतराल कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार कम किया जा सकता है। विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि किसान हर बार एक ही फफूंदनाशक का उपयोग न करें, बल्कि अलग-अलग समूह की दवाओं का प्रयोग करें ताकि रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित न हो।
स्टिकर और जल निकासी पर भी दें विशेष ध्यान
विशेषज्ञों का कहना है कि प्रत्येक छिड़काव के साथ लगभग 0.1 प्रतिशत स्टिकर यानी एक मिली प्रति लीटर पानी मिलाने से दवा पत्तियों पर अच्छी तरह चिपकती है और उसका प्रभाव अधिक समय तक बना रहता है। इसके अलावा खेत में पानी का जमाव नहीं होने देना चाहिए। अच्छी जल निकासी और खरपतवार नियंत्रण से खेत में अतिरिक्त नमी कम रहती है, जिससे Aloo me Late Blight Rog फैलने की संभावना भी काफी घट जाती है।
विशेषज्ञों की किसानों को अंतिम सलाह
विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून के दौरान Aloo me Late Blight Rog को हल्के में नहीं लेना चाहिए। यदि किसान नियमित रूप से फसल की निगरानी करें, शुरुआती लक्षणों की पहचान करें और समय पर अनुशंसित फफूंदनाशकों का उपयोग करें तो फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है। किसी भी दवा का प्रयोग हमेशा कृषि विशेषज्ञ या कृषि विभाग की सलाह के अनुसार ही करें, ताकि रोग पर प्रभावी नियंत्रण के साथ बेहतर उत्पादन भी प्राप्त हो सके
