इस साल मानसून का मिजाज किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। जून में कई राज्यों में बारिश की कमी के कारण सूखे जैसे हालात बने, जबकि जुलाई और अगस्त में कई इलाकों में भारी बारिश और बाढ़ ने परेशानी बढ़ा दी। Mausam Ka Kharif Ki Kheti Par Asar इस समय देश के अलग-अलग हिस्सों में साफ दिखाई दे रहा है। भारत में खरीफ फसलों की खेती काफी हद तक मानसून पर निर्भर रहती है। ऐसे में बारिश का सही समय पर और पर्याप्त मात्रा में होना जरूरी है। इस साल कहीं कम बारिश तो कहीं अत्यधिक बारिश ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है।
Mausam Ka Kharif Ki Kheti Par Asar क्यों बढ़ा?
मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 1 जून 2026 से 9 अगस्त 2026 तक देश में औसतन 466.5 मिलीमीटर बारिश हुई। सामान्य तौर पर इस अवधि में 526.9 मिलीमीटर बारिश होनी चाहिए थी। यानी देश में सामान्य से करीब 11 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। हालांकि देशभर में बारिश को सामान्य श्रेणी में माना जा रहा है, लेकिन राज्यों के बीच बारिश का वितरण काफी असमान रहा है। यही वजह है कि Mausam Ka Kharif Ki Kheti Par Asar अलग-अलग क्षेत्रों में अलग दिखाई दे रहा है।
कहीं भारी बारिश तो कहीं सूखे जैसे हालात
इस मानसून में कुछ राज्यों में सामान्य से काफी अधिक बारिश हुई है। दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव में सामान्य से करीब 69 प्रतिशत ज्यादा बारिश दर्ज की गई। लद्दाख में सामान्य से 176 प्रतिशत अधिक बारिश हुई। दिल्ली में 27 प्रतिशत और ओडिशा में 28 प्रतिशत अधिक बारिश रिकॉर्ड की गई।
दूसरी ओर, अरुणाचल प्रदेश में सामान्य से 37 प्रतिशत, मेघालय में 56 प्रतिशत और बिहार में 36 प्रतिशत कम बारिश हुई। पंजाब में करीब 35 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश में 33 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई। बारिश के इस असंतुलन से Mausam Ka Kharif Ki Kheti Par Asar सबसे ज्यादा उन क्षेत्रों में दिखाई दे रहा है, जहां किसान सिंचाई के लिए मानसून पर निर्भर हैं।
जून में बारिश की कमी से बढ़ी परेशानी
जून के महीने में कई राज्यों में बारिश की कमी रही। छत्तीसगढ़ और पूर्वी मध्य प्रदेश जैसे कृषि प्रधान क्षेत्रों में कम बारिश के कारण खेतों में पर्याप्त नमी नहीं बन पाई। गुजरात और विदर्भ के कई इलाकों में भी लंबे समय तक बारिश की कमी रही। इससे किसानों को खरीफ फसलों की बुवाई में परेशानी हुई। खेतों में नमी कम होने के कारण कई किसानों को बारिश का इंतजार करना पड़ा। जून की इस स्थिति ने Mausam Ka Kharif Ki Kheti Par Asar को और गंभीर बना दिया, क्योंकि खरीफ फसलों की शुरुआती बढ़वार के लिए पर्याप्त नमी जरूरी होती है।
जुलाई में बदला मानसून का मिजाज
जुलाई के मध्य के बाद मानसून ने करवट ली। कई राज्यों में बारिश की गतिविधियां बढ़ीं और किसानों को राहत मिली। 22 जुलाई, 29 जुलाई और 5 अगस्त वाले सप्ताह में कई क्षेत्रों में सामान्य से अधिक बारिश दर्ज की गई। छत्तीसगढ़ में 22 जुलाई वाले सप्ताह में सामान्य से 33 प्रतिशत, 29 जुलाई वाले सप्ताह में 16 प्रतिशत और 5 अगस्त वाले सप्ताह में 26 प्रतिशत अधिक बारिश हुई।
मध्य महाराष्ट्र में अगस्त के पहले सप्ताह में सामान्य से करीब 140 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई। ओडिशा में भी जुलाई के अलग-अलग सप्ताह में सामान्य से काफी ज्यादा बारिश हुई।हालांकि इस बदलाव से कुछ क्षेत्रों को राहत मिली, लेकिन कई जगह अत्यधिक बारिश ने Mausam Ka Kharif Ki Kheti Par Asar को एक नई समस्या में बदल दिया।
भारी बारिश से फसलों को जलभराव का खतरा
जहां कम बारिश से किसान परेशान हैं, वहीं अधिक बारिश वाले क्षेत्रों में जलभराव और बाढ़ की समस्या सामने आई है। खेतों में लंबे समय तक पानी जमा रहने से पौधों की जड़ों को नुकसान हो सकता है। खासकर धान के अलावा दलहन, तिलहन और कुछ अन्य खरीफ फसलों में अधिक जलभराव नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए किसानों के लिए सिर्फ बारिश होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि बारिश का सही मात्रा में और सही समय पर होना भी जरूरी है। यही कारण है कि Mausam Ka Kharif Ki Kheti Par Asar को समझने के लिए बारिश की मात्रा के साथ उसके वितरण को भी देखना जरूरी है।
खरीफ फसलों की बुवाई में आई कमी
कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 31 जुलाई 2026 तक देश में कुल 894.22 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुवाई हुई थी। पिछले साल इसी अवधि तक 920.72 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई पूरी हो चुकी थी। यानी इस साल करीब 26.50 लाख हेक्टेयर कम क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुवाई हुई है। बारिश में देरी और असमान वितरण को बुवाई में आई इस कमी की एक बड़ी वजह माना जा रहा है। इसका सीधा संबंध Mausam Ka Kharif Ki Kheti Par Asar से भी है।
धान की बुवाई में आई कमी
धान खरीफ सीजन की प्रमुख फसलों में शामिल है। इस साल 31 जुलाई तक करीब 301.49 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की बुवाई हुई। पिछले साल इसी अवधि में 308.39 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान बोया गया था। यानी इस साल धान की बुवाई में करीब 6.89 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है। धान की बुवाई में आई कमी भी बताती है कि Mausam Ka Kharif Ki Kheti Par Asar किसानों के फैसलों और खेती के क्षेत्र पर किस तरह पड़ रहा है।
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दलहन और मोटे अनाज की बुवाई भी पीछे
इस साल दलहन की बुवाई करीब 95.18 लाख हेक्टेयर में हुई है। पिछले साल इसी समय तक 101.60 लाख हेक्टेयर में दलहन की बुवाई हो चुकी थी। इसी तरह मोटे अनाज की बुवाई भी पिछले साल के 170.60 लाख हेक्टेयर से घटकर इस साल 157.77 लाख हेक्टेयर रह गई है। बारिश की अनिश्चितता के कारण कई क्षेत्रों में किसानों को फसल चयन और बुवाई के समय में बदलाव करना पड़ा है। इससे भी Mausam Ka Kharif Ki Kheti Par Asar सामने आया है।
तिलहन की बुवाई से मिली राहत
कमजोर बुवाई के बीच तिलहन किसानों के लिए राहत की खबर है। इस साल तिलहन की बुवाई करीब 172.32 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हुई है। पिछले साल इसी अवधि में तिलहन की बुवाई 171.13 लाख हेक्टेयर में हुई थी। यानी इस साल तिलहन का रकबा करीब 1.19 लाख हेक्टेयर बढ़ा है। यह आंकड़ा खरीफ सीजन में किसानों की फसल पसंद में आए बदलाव को भी दिखाता है। हालांकि कुल मिलाकर Mausam Ka Kharif Ki Kheti Par Asar अभी भी कई राज्यों में चिंता का विषय बना हुआ है।
आगे मानसून रहेगा बेहद महत्वपूर्ण
आने वाले दिनों में बारिश का वितरण खरीफ फसलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहेगा। जिन क्षेत्रों में बारिश की कमी है, वहां अच्छी बारिश से फसलों को राहत मिल सकती है। वहीं अधिक बारिश वाले क्षेत्रों में जलनिकासी पर ध्यान देना जरूरी होगा। किसानों को स्थानीय मौसम पूर्वानुमान के आधार पर सिंचाई, कीटनाशक छिड़काव और फसल प्रबंधन से जुड़े फैसले लेने चाहिए। Mausam Ka Kharif Ki Kheti Par Asar को देखते हुए मौसम में अचानक बदलाव पर नजर रखना भी जरूरी है। इस साल मानसून ने एक तरफ सूखे और दूसरी तरफ भारी बारिश की चुनौती खड़ी की है। इसलिए खरीफ सीजन में किसानों के लिए बारिश की मात्रा से ज्यादा उसका सही समय और वितरण महत्वपूर्ण रहने वाला है।
