करेला एक ऐसी सब्जी है जिसकी मांग सालभर बनी रहती है. इसके कड़वे स्वाद के कारण भी लोग इसे सेहत के लिए बेहद फायदेमंद मानते हैं.करेला डायबिटीज, पाचन और खून साफ करने जैसी कई खूबियों के कारण बाजार में इसकी खपत लगातार रहती है.
आज के समय में किसान ऐसी फसल की तलाश में रहते हैं, जिसमें लागत कम हो, मेहनत भी ज्यादा न लगे साथ ही बाजार में अच्छी कीमत भी मिल जाए. अगर आप भी ऐसी ही फसल की योजना बना रहे हैं, तो बसंत के मौसम यानी फरवरी और मार्च का समय आपके लिए खास हो सकता है. इस दौरान करेले की ‘कल्याणपुर बारहमासी’ किस्म की बुवाई करके किसान कम समय में अच्छी आमदनी हासिल कर सकते हैं.
करेला एक ऐसी सब्जी है जिसकी मांग सालभर बनी रहती है. इसके कड़वे स्वाद के कारण भी लोग इसे सेहत के लिए बेहद फायदेमंद मानते हैं. डायबिटीज, पाचन और खून साफ करने जैसी कई खूबियों के कारण बाजार में इसकी खपत लगातार रहती है. यही वजह है कि इसकी खेती किसानों के लिए फायदे का सौदा बन सकती है. February-march me kare karele ki kheti , 55-60 din me taiyar fasal or jabardast munafa

क्यों खास है ‘कल्याणपुर बारहमासी’ किस्म
‘कल्याणपुर बारहमासी’ किस्म को इसकी अच्छी पैदावार और तेज बढ़वार के लिए जाना जाता है. यह किस्म जल्दी से तैयार हो जाती है और फल की गुणवत्ता भी अच्छी रहती है. इसके फल मध्यम आकार के, गहरे हरे रंग के और बाजार में आसानी से बिकने वाले होते हैं.
सबसे बड़ी बात यह है कि यह किस्म लगभग 55 से 60 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. यानी किसान कम समय में फसल लेकर जल्दी कमाई शुरू कर सकते हैं. इससे एक ही सीजन में दो या तीन बार उत्पादन कर लेना भी संभव हो सकता है.
खेती के लिए उपयुक्त जमीन और तैयारी
करेले की खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली रेतीली दोमट मिट्टी सबसे बेहतर मानी जाती है. खेत में पानी रुकना नहीं चाहिए, क्योंकि इससे जड़ों को नुकसान हो सकता है. बुवाई से पहले खेत की अच्छी तरह जुताई कर लें और उसमें सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाएं. इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और पौधों की बढ़वार बेहतर होती है.
बीज हमेशा प्रमाणित और उच्च गुणवत्ता वाले ही चुनें. अच्छी किस्म का बीज ही बेहतर उत्पादन की गारंटी देता है. बुवाई के समय पौधों के बीच पर्याप्त दूरी रखें ताकि बेलों को फैलने की जगह मिल सके.
सिंचाई और देखभाल का तरीका
करेले की फसल को समय-समय पर हल्की सिंचाई की जरूरत होती है. ज्यादा पानी देने से जडो के सड़ने की समस्या हो सकती है, इसलिए जरूरत के अनुसार ही सिंचाई करें.
फसल के दौरान निराई-गुड़ाई करते रहें ताकि खेत में खरपतवार न आ पाए . बेलों को सहारा देने के लिए मचान या तार का सहारा देना फायदेमंद रहता है. इससे फल जमीन को छूते नहीं और गुणवत्ता बेहतर रहती है.
कीट और रोग नियंत्रण पर भी ध्यान देना जरूरी है. समय पर जैविक या अनुशंसित दवाओं का उपयोग करने से फसल सुरक्षित रहती है.
कितनी हो सकती है पैदावार और कमाई
अगर खेती सही तरीके से की जाए तो एक एकड़ जमीन से लगभग 60 से 65 क्विंटल तक करेले की पैदावार हो सकती है. बाजार में करेले की कीमत मौसम और मांग के अनुसार बदलती रहती है, लेकिन औसतन अच्छी दर मिलने पर किसान 2 से 2.5 लाख रुपये तक की कमाई कर सकते हैं.
इस फसल में लागत अपेक्षाकृत कम होती है, क्योंकि बीज, खाद और सिंचाई पर ज्यादा खर्चा नहीं आता. जल्दी तैयार होने वाली फसल होने के कारण पूंजी भी जल्दी वापस आ जाती है, जिससे किसानों को नकदी की कमी नहीं होती. February-march me kare karele ki kheti , 55-60 din me taiyar fasal or jabardast munafa

क्यों चुनें बसंत का मौसम
फरवरी और मार्च का मौसम करेले की बुवाई के लिए अनुकूल माना जाता है. इस समय तापमान संतुलित रहता है, जिससे पौधों की बढ़वार अच्छी तरह से होती है. गर्मी बढ़ने से पहले फसल तैयार हो जाती है, जिससे कीट और रोग का खतरा भी कम रहता है.
बसंत में की गई बुवाई से फसल गर्मियों की शुरुआत में बाजार में पहुंच जाती है, जब ताजी सब्जियों की मांग ज्यादा रहती है और कीमत भी बेहतर मिलती है.
छोटे किसानों के लिए बेहतर विकल्प
कम समय में तैयार होने वाली और अच्छी आमदनी देने वाली यह फसल छोटे और मध्यम किसानों के लिए खास तौर पर फायदेमंद है. अगर सही तकनीक और समय का ध्यान रखा जाए तो करेले की ‘कल्याणपुर बारहमासी’ किस्म खेती को लाभ का मजबूत साधन बना सकती है. February-march me kare karele ki kheti , 55-60 din me taiyar fasal or jabardast munafa
