Duniya me chawal ka badsaah bana bharat: भारत ने वैश्विक कृषि बाजार में एक बार फिर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराते हुए चावल उत्पादन और निर्यात में दुनिया में पहला स्थान हासिल कर लिया है। आज भारत न सिर्फ सबसे बड़ा चावल उत्पादक देशों में शामिल है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय चावल की मांग भी लगातार बढ़ रही है। हालांकि, इस बड़ी उपलब्धि के पीछे एक गंभीर चिंता भी छिपी है—देश के प्रमुख धान उत्पादक राज्यों पंजाब और हरियाणा में भूजल स्तर तेजी से गिरता जा रहा है, जो भविष्य के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
चावल उत्पादन में भारत की वैश्विक बादशाहत
भारत में अनुकूल जलवायु, उपजाऊ मिट्टी और किसानों की मेहनत के चलते हर साल रिकॉर्ड मात्रा में धान का उत्पादन होता है। बासमती और नॉन-बासमती दोनों श्रेणियों में भारतीय चावल की अंतरराष्ट्रीय मांग बढ़ी है। सरकारी खरीद व्यवस्था, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और निर्यात अनुकूल नीतियों ने किसानों को धान की खेती के लिए प्रोत्साहित किया है। नतीजतन, भारत ने कई वर्षों से वैश्विक चावल बाजार में अपनी बादशाहत कायम रखी है।

पंजाब–हरियाणा: धान की खेती का केंद्र
हरित क्रांति के बाद से पंजाब और हरियाणा देश के प्रमुख अनाज भंडार बनकर उभरे। यहां उच्च उत्पादक किस्मों, सिंचाई सुविधाओं और सरकारी खरीद की मजबूत व्यवस्था के कारण धान की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। किसानों को सुनिश्चित बाजार और बेहतर कीमत मिलने से धान इन राज्यों की प्रमुख फसल बन गई। Duniya me chawal ka badsaah bana bharat
गिरता भूजल: बढ़ती चिंता
धान एक अधिक पानी खपत करने वाली फसल है। पंजाब और हरियाणा में बारिश की सीमित मात्रा के कारण सिंचाई के लिए बड़े पैमाने पर ट्यूबवेल और बोरवेल का सहारा लिया जाता है। लगातार भूजल दोहन से जलस्तर हर साल और नीचे जा रहा है। कई क्षेत्रों में जलस्तर खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है, जिससे भविष्य में खेती, पीने के पानी और पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ सकता है।
किसानों और पर्यावरण पर असर
भूजल स्तर गिरने से किसानों की लागत बढ़ रही है क्योंकि पानी निकालने के लिए ज्यादा गहराई तक बोरिंग करनी पड़ती है। इससे बिजली और डीजल की खपत बढ़ती है और खेती का मुनाफा घटता है। साथ ही, लंबे समय में जमीन की उर्वरता और पर्यावरण संतुलन पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। Duniya me chawal ka badsaah bana bharat

समाधान की जरूरत
विशेषज्ञ मानते हैं कि चावल उत्पादन में सफलता के साथ-साथ जल संरक्षण पर भी उतना ही ध्यान देना होगा। कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना, धान की जगह वैकल्पिक फसल चक्र अपनाना, ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी जल-संरक्षण तकनीकों का उपयोग, और किसानों को जागरूक करना समय की मांग है। सरकार और किसानों के संयुक्त प्रयास से ही चावल की वैश्विक बादशाहत को बनाए रखते हुए भूजल संकट से निपटा जा सकता है।
निष्कर्ष
भारत का दुनिया में चावल का बादशाह बनना गर्व की बात है, लेकिन पंजाब–हरियाणा में तेजी से गिरता भूजल एक चेतावनी भी है। यदि समय रहते संतुलित नीतियां और टिकाऊ खेती के उपाय नहीं अपनाए गए, तो यह सफलता भविष्य में चुनौती बन सकती है। टिकाऊ कृषि ही देश के किसानों और पर्यावरण दोनों के लिए दीर्घकालिक समाधान है। Duniya me chawal ka badsaah bana bharat
