Green Gram Farming: मूंग भारत की प्रमुख दलहनी फसलों में से एक है, जिसकी खेती ग्रीष्म (जायद) और खरीफ दोनों मौसमों में सफलतापूर्वक की जाती है। विशेष रूप से मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और हरियाणा जैसे राज्यों में इसकी बड़े पैमाने पर खेती होती है। कम अवधि में तैयार होने वाली यह फसल किसानों के लिए कम लागत में अधिक लाभ देने वाली फसल मानी जाती है। मूंग का उपयोग मुख्य रूप से दाल, अंकुरित अनाज, बेसन, नमकीन और विभिन्न खाद्य उत्पादों में किया जाता है, जिससे इसकी बाजार में हमेशा अच्छी मांग बनी रहती है। Green Gram Farming
पोषण की दृष्टि से भी मूंग अत्यंत महत्वपूर्ण फसल है। इसके दानों में लगभग 24–26 प्रतिशत प्रोटीन, 55–60 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 1–2 प्रतिशत वसा तथा पर्याप्त मात्रा में विटामिन, खनिज और फाइबर पाए जाते हैं। यही कारण है कि इसे संतुलित और पौष्टिक आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। Green Gram Farming
मूंग केवल आर्थिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि भूमि की उर्वरता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह एक दलहनी फसल होने के कारण इसकी जड़ों में राइजोबियम जीवाणुओं की गांठें बनती हैं, जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन को भूमि में स्थिर करके मिट्टी को प्राकृतिक रूप से उपजाऊ बनाती हैं। Green Gram Farming
सामान्यतः यह फसल प्रति हेक्टेयर लगभग 35–40 किलोग्राम नाइट्रोजन भूमि में जोड़ने की क्षमता रखती है। फसल कटाई के बाद इसकी जड़ें और पौधों के अवशेष मिट्टी में मिलकर लगभग 1–1.5 टन जैविक पदार्थ उपलब्ध कराते हैं, जिससे जैविक कार्बन बढ़ता है, मिट्टी की संरचना सुधरती है और अगली फसल को भी लाभ मिलता है। Green Gram Farming

वर्तमान समय में कई क्षेत्रों में मूंग की औसत उत्पादकता अभी भी अपेक्षाकृत कम है। इसका मुख्य कारण उन्नत किस्मों का सीमित उपयोग, संतुलित पोषण की कमी, समय पर बुवाई न होना तथा रोग एवं कीटों का उचित प्रबंधन न होना है। यदि किसान प्रमाणित बीज, उन्नत किस्मों, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, उचित सिंचाई तथा आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाएं, तो आसानी से 8 से 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर या अनुकूल परिस्थितियों में इससे भी अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। Green Gram Farming
बढ़ती मांग, कम लागत, कम अवधि और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने की क्षमता के कारण मूंग की खेती किसानों के लिए एक लाभदायक और टिकाऊ विकल्प बनती जा रही है। उचित वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर किसान अच्छी पैदावार के साथ बेहतर मुनाफा भी कमा सकते हैं। Green Gram Farming
मूंग की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु
मूंग एक गर्म एवं आर्द्र जलवायु में अच्छी वृद्धि करने वाली दलहनी फसल है। इसकी खेती खरीफ और ग्रीष्म (जायद) दोनों मौसमों में सफलतापूर्वक की जा सकती है। बेहतर अंकुरण, पौधों की तेज वृद्धि और अधिक उत्पादन के लिए 25 से 32 डिग्री सेल्सियस तापमान सबसे उपयुक्त माना जाता है। इस तापमान पर पौधों का विकास तेजी से होता है और फलियों का निर्माण भी बेहतर होता है। Green Gram Farming
मूंग की फसल के लिए लगभग 75 से 90 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा पर्याप्त मानी जाती है। खरीफ मौसम में समय पर और संतुलित वर्षा अच्छी पैदावार के लिए लाभदायक होती है, जबकि अधिक जलभराव या लगातार बारिश फसल को नुकसान पहुंचा सकती है। फूल आने और फलियां बनने के समय हल्की नमी लाभदायक रहती है, लेकिन फसल पकने के समय साफ और शुष्क मौसम सबसे अच्छा माना जाता है। Green Gram Farming
कटाई के समय अधिक वर्षा होने पर फलियां फटने, दानों के अंकुरित होने और गुणवत्ता घटने का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए पकने के समय लगभग 60 प्रतिशत तक आर्द्रता और साफ मौसम आदर्श माना जाता है। Green Gram Farming
मूंग की खेती के लिए उपयुक्त भूमि
मूंग की खेती लगभग सभी प्रकार की मिट्टियों में की जा सकती है, लेकिन अच्छी जल निकासी वाली दोमट, बलुई दोमट तथा हल्की काली मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। भूमि का pH मान 6.5 से 7.5 के बीच हो तो पौधों की वृद्धि बेहतर होती है और पोषक तत्वों का अवशोषण भी आसानी से होता है। Green Gram Farming
ऐसे खेतों का चयन करें जहां वर्षा या सिंचाई का पानी अधिक समय तक न रुके, क्योंकि जलभराव की स्थिति में जड़ सड़न, फफूंदजनित रोग और पौधों के खराब होने की संभावना बढ़ जाती है। खेत की मिट्टी भुरभुरी, उपजाऊ और जैविक पदार्थों से भरपूर होने पर फसल अधिक उत्पादन देती है। Green Gram Farming
भूमि की तैयारी कैसे करें?
अच्छी पैदावार के लिए खेत की तैयारी वैज्ञानिक तरीके से करना बेहद जरूरी है। खरीफ मौसम की मूंग की खेती के लिए सबसे पहले मिट्टी पलटने वाले हल से एक गहरी जुताई करें, जिससे पुराने खरपतवार, कीट एवं रोगजनक नष्ट हो जाएं और मिट्टी अच्छी तरह पलट जाए। पहली बारिश होने के बाद 2–3 बार कल्टीवेटर या देशी हल से जुताई करें और प्रत्येक जुताई के बाद पाटा लगाकर खेत को समतल एवं भुरभुरा बना लें। इससे नमी का संरक्षण होता है और बीजों का अंकुरण समान रूप से होता है। Green Gram Farming
यदि खेत में दीमक की समस्या रहती है, तो खेत की अंतिम तैयारी के समय कृषि विशेषज्ञ की सलाह अनुसार उपयुक्त कीटनाशी का प्रयोग करें। इससे शुरुआती अवस्था में पौधों को नुकसान से बचाया जा सकता है। Green Gram Farming

ग्रीष्मकालीन (जायद) मूंग की खेती के लिए रबी फसल की कटाई के तुरंत बाद खेत की जुताई करें। इसके बाद पलेवा (पूर्व सिंचाई) करें और 4–5 दिन बाद जब मिट्टी उपयुक्त नमी की स्थिति में आ जाए, तब 2–3 बार जुताई करके पाटा लगाएं। इस प्रक्रिया से खेत समतल, भुरभुरा और खरपतवार रहित बन जाता है, जिससे बीजों का अंकुरण तेज होता है, पौधों की प्रारंभिक वृद्धि अच्छी रहती है और अधिक उत्पादन प्राप्त होता है। Green Gram Farming
मूंग की बुवाई का सही समय
मूंग की फसल खरीफ और ग्रीष्म (जायद) दोनों मौसमों में उगाई जाती है, लेकिन अधिक उत्पादन के लिए सही समय पर बुवाई करना बेहद आवश्यक है।
खरीफ मौसम में मूंग की बुवाई जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के पहले सप्ताह तक करना सबसे उपयुक्त माना जाता है। यह समय मानसून की शुरुआत के साथ होता है, जिससे बीजों का अंकुरण और पौधों की शुरुआती वृद्धि अच्छी होती है। Green Gram Farming
वहीं ग्रीष्म (जायद) मौसम की मूंग की बुवाई फरवरी के अंतिम सप्ताह से लेकर 15 मार्च तक पूरी कर लेनी चाहिए। यदि बुवाई में अधिक देरी हो जाती है, तो फूल आने के समय तापमान बढ़ने लगता है, जिससे फलियों की संख्या कम हो जाती है और उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है। इसलिए अधिक उपज के लिए समय पर बुवाई करना बेहद जरूरी है।
बीज दर एवं बीज उपचार
अच्छी पैदावार के लिए प्रमाणित और उन्नत गुणवत्ता वाले बीजों का चयन करें। बीज की मात्रा मौसम और बुवाई की विधि के अनुसार निर्धारित करनी चाहिए।
कम पौधे, ज्यादा उत्पादन!, केले की खेती का यह तरीका दिला रहा मोटी कमाई
- खरीफ मौसम: 18–20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर
- ग्रीष्म (जायद) मौसम: 25–30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर
बुवाई से पहले बीजों का उपचार करना अत्यंत आवश्यक है, जिससे बीजजनित रोगों से बचाव होता है और अंकुरण बेहतर होता है। इसके लिए प्रति किलोग्राम बीज को कार्बेन्डाजिम + कैप्टान (1:2 मिश्रण) की लगभग 3 ग्राम मात्रा से उपचारित करें। Green Gram Farming
इसके अलावा, दलहनी फसल होने के कारण बीजों को राइजोबियम (Rhizobium) एवं पीएसबी (Phosphate Solubilizing Bacteria) कल्चर से उपचारित करने पर जड़ों में गांठों का बेहतर विकास होता है, जिससे नाइट्रोजन स्थिरीकरण बढ़ता है और फसल की उत्पादकता में सुधार होता है। Green Gram Farming
मूंग की बुवाई का सही तरीका
अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए मूंग की बुवाई हमेशा कतार विधि (लाइन sowing) से करनी चाहिए। इससे पौधों की उचित दूरी बनी रहती है, खरपतवार नियंत्रण आसान होता है और सिंचाई व अन्य कृषि कार्यों में सुविधा मिलती है। Green Gram Farming
खरीफ फसल के लिए
- कतार से कतार की दूरी: 30–45 सेंटीमीटर
- पौधे से पौधे की दूरी: 10–15 सेंटीमीटर
ग्रीष्म (जायद) फसल के लिए
- कतार से कतार की दूरी: 20–22.5 सेंटीमीटर
- पौधे से पौधे की दूरी: 10 सेंटीमीटर
बीजों को लगभग 3–4 सेंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए। अधिक गहराई पर बुवाई करने से अंकुरण प्रभावित हो सकता है, जबकि बहुत उथली बुवाई करने पर बीज सूखने का खतरा रहता है।
खाद एवं उर्वरक प्रबंधन
मूंग की फसल दलहनी होने के कारण वातावरण से नाइट्रोजन प्राप्त करने की क्षमता रखती है, फिर भी शुरुआती वृद्धि के लिए संतुलित पोषण आवश्यक होता है।
प्रति हेक्टेयर सामान्यतः निम्न मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग किया जा सकता है।
- नाइट्रोजन (N): 20 किलोग्राम
- फास्फोरस (P₂O₅): 20 किलोग्राम
- पोटाश (K₂O): 20 किलोग्राम
- गंधक (S): 20 किलोग्राम
- जिंक (ZnSO₄): आवश्यकता अनुसार लगभग 20–25 किलोग्राम जिंक सल्फेट (यदि मिट्टी में कमी हो)
नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय बीज से लगभग 5–10 सेंटीमीटर नीचे आधार खाद (Basal Dose) के रूप में दें। यदि संभव हो तो खेत में अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट भी मिलाएं, जिससे मिट्टी की उर्वरता और जल धारण क्षमता बढ़ती है।
सिंचाई एवं जल निकास
खरीफ मौसम में सामान्यतः वर्षा के कारण अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती। हालांकि यदि लंबे समय तक वर्षा न हो और खेत में नमी की कमी महसूस हो, तो फलियां बनने की अवस्था पर एक हल्की सिंचाई अवश्य करें। इस समय पर्याप्त नमी रहने से दानों का विकास बेहतर होता है और उत्पादन बढ़ता है।ग्रीष्म (जायद) मौसम में तापमान अधिक होने के कारण लगभग 10–15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करना आवश्यक होता है। मिट्टी की नमी और मौसम के अनुसार सिंचाई का अंतराल कम या अधिक किया जा सकता है।
फसल पकने से लगभग 15 दिन पहले सिंचाई बंद कर दें, ताकि फलियां अच्छी तरह पक सकें और कटाई के समय नमी की समस्या न हो।मूंग की फसल जलभराव को बिल्कुल सहन नहीं करती। इसलिए वर्षा के दौरान खेत में पानी जमा होने पर तुरंत निकासी की व्यवस्था करें। उचित जल निकास से जड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती है, पौधे स्वस्थ रहते हैं और जड़ सड़न जैसी समस्याओं से बचाव होता है।
खरपतवार नियंत्रण
बुवाई के 20–25 दिन बाद पहली निराई-गुड़ाई करें। आवश्यकता होने पर 40 दिन बाद दूसरी निराई करें।
अधिक खरपतवार होने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार उपयुक्त खरपतवारनाशी का प्रयोग किया जा सकता है।
प्रमुख कीट एवं रोग
1. पीला मोजेक रोग
लक्षण: पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और पौधे कमजोर हो जाते हैं।
बचाव: रोगरोधी किस्मों का चयन करें तथा सफेद मक्खी का नियंत्रण करें।
2. चूर्णी फफूंद
लक्षण: पत्तियों पर सफेद चूर्ण दिखाई देता है।
बचाव: समय पर फफूंदनाशी का छिड़काव करें।
3. माहू एवं सफेद मक्खी
ये कीट पौधों का रस चूसकर नुकसान पहुंचाते हैं।
बचाव: नियमित निगरानी करें और आवश्यकता होने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह अनुसार कीटनाशी का प्रयोग करें।
कटाई एवं मड़ाई
जब लगभग 80–90% फलियां काली या भूरे रंग की हो जाएं, तब फसल की कटाई करें।कटाई के बाद फसल को 3–4 दिन धूप में सुखाकर मड़ाई करें और साफ दानों को अच्छी तरह सुखाकर सुरक्षित स्थान पर संग्रहित करें।
मूंग की खेती में उत्पादन
यदि किसान उन्नत किस्मों और वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाते हैं तो औसतन 8–12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। अनुकूल परिस्थितियों और बेहतर प्रबंधन के साथ इससे अधिक उत्पादन भी संभव है।
मूंग की खेती से कमाई
मूंग एक नकदी और दलहनी फसल है। बाजार में इसकी अच्छी मांग और बेहतर कीमत मिलने के कारण किसान कम समय में अच्छा लाभ कमा सकते हैं। इसके अलावा यह अगली फसल के लिए मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में भी मदद करती है, जिससे उर्वरकों पर होने वाला खर्च कम हो जाता है।
निष्कर्ष
मूंग की खेती कम लागत, कम अवधि और अधिक लाभ देने वाली खेती है। यदि किसान सही समय पर बुवाई, उन्नत किस्मों का चयन, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, समय पर सिंचाई तथा रोग एवं कीट नियंत्रण पर विशेष ध्यान दें, तो आसानी से बेहतर उत्पादन और अधिक मुनाफा प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए वैज्ञानिक खेती तकनीकों को अपनाकर मूंग की खेती को लाभदायक व्यवसाय बनाया जा सकता है।
