Tuar Ki Kheti Se Jyada Munafa नवापुर देसी तुअर यहां के लोगों के दैनिक भोजन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे आमतौर पर चावल के साथ खाया जाता है। इसी कारण क्षेत्र के अधिकांश किसान इसे अपनी घरेलू जरूरतों को ध्यान में रखकर उगाते हैं और अक्सर धान, सोयाबीन या मूंगफली जैसी फसलों के साथ मिलाकर (इंटरक्रॉपिंग) इसकी खेती करते हैं। जब उत्पादन जरूरत से अधिक हो जाता है, तभी किसान इसे बाजार में बिक्री के लिए ले जाते है Tuar Ki Kheti Se Jyada Munafa
तुअर दाल पूरे देश में बड़े चाव से खाई जाती है और इसका बाजार भाव भी अन्य दालों के मुकाबले अधिक रहता है। हालांकि इसकी खेती लगभग पूरे भारत में होती है, लेकिन नवापुर की तुअर दाल अपनी खास पहचान रखती है। अपने अनोखे स्वाद और गुणवत्ता के कारण इसे वर्ष 2016 में जीआई टैग भी मिला है। यह खास किस्म महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले के नवापुर क्षेत्र में उगाई जाती है, जहां इसे मुख्य रूप से आदिवासी महिलाएं पारंपरिक और प्राकृतिक तरीके से तैयार करती हैं। इसके दाने छोटे होते हैं, यह जल्दी पक जाती है और इसका रंग हल्का सुनहरा-सफेद होता है, जो इसे अन्य किस्मों से अलग बनाता है। Tuar Ki Kheti Se Jyada Munafa

Tuar Ki Kheti Se Jyada Munafa
नवापुर तुअर दाल मुख्य रूप से काली मिट्टी और पहाड़ी क्षेत्रों में उगाई जाती है। इसे पारंपरिक तरीके से राख के साथ भूनकर तैयार किया जाता है, जिससे इसमें खास तरह की सुगंध और स्वाद विकसित होता है। यह दाल आकार में छोटी, सफेद रंग की और जल्दी पकने वाली होती है, जो इसे रसोई में उपयोग के लिए बेहद सुविधाजनक बनाती है। पोषण की दृष्टि से इसमें प्रोटीन और फाइबर की अच्छी मात्रा पाई जाती है, साथ ही इसमें हानिकारक तत्व कम होते हैं, जिससे यह सेहत के लिए लाभकारी मानी जाती है। Tuar Ki Kheti Se Jyada Munafa
स्थानीय स्तर पर इसे देसी तुअर, गावरान तुअर, पांढरी तुअर और दिवाली के आसपास उपलब्ध होने के कारण दिवाल तुअर जैसे नामों से भी जाना जाता है। खासतौर पर यह उन लोगों के लिए उपयुक्त है, जो कम तेल में बनने वाली हल्की और पौष्टिक दाल पसंद करते हैं। Tuar Ki Kheti Se Jyada Munafa
बुवाई से पहले करें बीज उपचार (Seed Treatment)
बेहतर अंकुरण और स्वस्थ फसल के लिए बुवाई से पहले बीजों का उपचार करना जरूरी होता है। इसके लिए बीजों को ट्राइकोडर्मा, राइजोबियम और पीएसबी (फॉस्फेट सॉल्युबल बैक्टीरिया) कल्चर से उपचारित करना चाहिए। इससे न केवल अंकुरण दर बढ़ती है, बल्कि पौधों की रोगों से लड़ने की क्षमता भी मजबूत होती है। Tuar Ki Kheti Se Jyada Munafa
नवापुर तुअर एक सूखा सहन करने वाली फसल है, इसलिए इसे अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। शुरुआती अवस्था में जरूरत के अनुसार हल्की सिंचाई करना पर्याप्त रहता है। उर्वरक प्रबंधन में नाइट्रोजन की कम मात्रा ही पर्याप्त होती है, जबकि प्रति एकड़ लगभग 50 किलोग्राम जिप्सम का उपयोग करने से उत्पादन में सुधार होता है और फसल की गुणवत्ता भी बेहतर होती है।
कितने दिनों में तैयार होती है फसल
नवापुर तुअर की यह खास किस्म अन्य तुअर की किस्मों की तुलना में छोटे दानों वाली होती है और मुख्यतः वर्षा आधारित खेती पर निर्भर रहती है, इसलिए इसे अलग से ज्यादा सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती। यह फसल अपेक्षाकृत जल्दी तैयार हो जाती है और सामान्यतः 90 से 120 दिनों के भीतर कटाई के लिए तैयार हो जाती है, जिससे किसानों को कम समय में उत्पादन मिल जाता है।
कटाई के बाद इस दाल को पारंपरिक तरीके से तैयार किया जाता है। इसके लिए तुअर के बीजों को राख के साथ बड़े तवे पर हल्का भूनकर उनका बाहरी नरम आवरण हटाया जाता है। इसके बाद इन बीजों को हाथ से चलने वाली पारंपरिक चक्की या जांता में पीसकर दाल तैयार की जाती है, जिससे इसका स्वाद और गुणवत्ता बनी रहती है। Tuar Ki Kheti Se Jyada Munafa
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160 गांवों में किसान कर रहे हैं तुअर की खेती
नवापुर की देसी तुअर यहां के लोगों के रोजमर्रा के भोजन का अहम हिस्सा है, जिसे आमतौर पर चावल के साथ खाया जाता है। इसी वजह से क्षेत्र के अधिकांश किसान इसे अपनी घरेलू जरूरतों के लिए उगाते हैं और अक्सर धान, सोयाबीन या मूंगफली जैसी फसलों के साथ मिलाकर (इंटरक्रॉपिंग) इसकी खेती करते हैं। जब उत्पादन जरूरत से ज्यादा हो जाता है, तभी किसान इसे बाजार में बेचते हैं। Tuar Ki Kheti Se Jyada Munafa
नवापुर तालुका कृषि कार्यालय के अनुसार, इस क्षेत्र के लगभग 160 गांवों में करीब 4,800 से अधिक हेक्टेयर भूमि पर इस खास तुअर दाल की खेती की जा रही है, जो इसकी लोकप्रियता और किसानों के बीच इसके महत्व को दर्शाता है। Tuar Ki Kheti Se Jyada Munafa

कब करते हैं इसकी बुवाई
नवापुर देसी तुअर की खेती एक तय और पारंपरिक प्रक्रिया के अनुसार की जाती है। सबसे पहले मई के तीसरे सप्ताह में खेत की अच्छी तरह सफाई कर ली जाती है, ताकि खरपतवार और पुराने फसल अवशेष हट जाएं। इसके बाद मिट्टी को भुरभुरा और उपजाऊ बनाने के लिए गहरी जुताई की जाती है। फिर 2–3 बार कल्टीवेटर चलाकर खेत को अच्छी तरह तैयार किया जाता है, जिससे बुवाई के लिए उचित बेड तैयार हो सके। Tuar Ki Kheti Se Jyada Munafa
मानसून की शुरुआत के बाद, जब खेत में पर्याप्त नमी हो जाती है और मिट्टी बुवाई के लिए अनुकूल हो जाती है, तब 15 जून से 15 जुलाई के बीच बुवाई की जाती है। यह समय सबसे उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि इस दौरान बीजों का अंकुरण तेजी से होता है और पौधों की शुरुआती वृद्धि अच्छी रहती है। Tuar Ki Kheti Se Jyada Munafa
बुवाई के लिए किसान आमतौर पर पिछले वर्ष की फसल से सुरक्षित और चुने हुए बीजों का ही उपयोग करते हैं, जिससे फसल की गुणवत्ता और उत्पादन में स्थिरता बनी रहती है। सही समय पर बुवाई और अच्छी खेत तैयारी के साथ यह फसल कम संसाधनों में भी बेहतर परिणाम देती है। Tuar Ki Kheti Se Jyada Munafa
इतनी दूरी पर करें दाल की बुवाई
नवापुर देसी तुअर की खेती में दूरी और फसल व्यवस्था का विशेष ध्यान रखा जाता है, खासकर इंटरक्रॉपिंग पद्धति में। बुवाई के दौरान सीड ड्रिल की मदद से धान या सोयाबीन की तीन पंक्तियां लगभग 30×30 सेंटीमीटर की दूरी पर बोई जाती हैं, और इनके साथ लगभग 120 सेंटीमीटर की दूरी पर तुअर की फसल लगाई जाती है। इस तरह की व्यवस्था से खेत की जगह का बेहतर उपयोग होता है और किसानों को एक साथ कई फसलों से लाभ मिलता है। Tuar Ki Kheti Se Jyada Munafa
तुअर की इस पारंपरिक खेती में आमतौर पर रासायनिक खाद या कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया जाता, जिससे यह फसल प्राकृतिक तरीके से उगाई जाती है। हालांकि, साथ में बोई गई धान या सोयाबीन की फसल में जरूरत के अनुसार थोड़ी मात्रा में यूरिया का उपयोग किया जाता है। अगस्त महीने में खेत की निराई-गुड़ाई की जाती है, ताकि खरपतवार नियंत्रण में रहें और पौधों को पर्याप्त पोषण मिल सके। कुछ किसान पौधों के बीच की मिट्टी को हल चलाकर ढीला करते हैं, जिससे नमी लंबे समय तक बनी रहती है और पानी जल्दी नहीं सूखता। इसके अलावा, पौधों को सहारा देना भी जरूरी होता है, ताकि वे सीधे और मजबूत बढ़ सकें।
जब फसल पकने लगती है, तो एक फली में सामान्यतः 3 से 4 दाने बनते हैं। पकने पर हवा चलने से फलियों में हल्की आवाज आने लगती है, जो किसानों के लिए कटाई का संकेत होती है। कटाई के बाद तुअर को पारंपरिक तरीके से गोबर से बने कमरों या भंडारण स्थानों में सुखाया जाता है, जिससे उसकी गुणवत्ता और स्वाद बरकरार रहता है। Tuar Ki Kheti Se Jyada Munafa
खबर से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े
नवापुर देसी तुअर की खेती से जुड़े कुछ अहम आंकड़े किसानों के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकते हैं। इसकी बुवाई सामान्यतः 120 सेंटीमीटर की दूरी पर की जाती है, जिससे पौधों को पर्याप्त जगह मिलती है और उनका विकास बेहतर होता है। यह फसल लगभग 90 से 120 दिनों में तैयार हो जाती है, जिससे कम समय में उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। Tuar Ki Kheti Se Jyada Munafa
इस क्षेत्र में करीब 160 गांवों के किसान तुअर की खेती कर रहे हैं, जो इसकी लोकप्रियता को दर्शाता है। नवापुर देसी तुअर का कुल रकबा लगभग 4,879 हेक्टेयर में फैला हुआ है, जो इसकी बड़े स्तर पर खेती को दिखाता है। एक फली में सामान्यतः 3 से 4 दाने बनते हैं, जिससे उत्पादन की अच्छी संभावना रहती है। Tuar Ki Kheti Se Jyada Munafa
उर्वरक प्रबंधन की बात करें तो प्रति एकड़ लगभग 50 किलोग्राम जिप्सम का उपयोग करना फसल के लिए लाभदायक माना जाता है, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार होता है।

निष्कर्ष
नवापुर देसी तुअर एक पारंपरिक, प्राकृतिक और कम लागत वाली फसल है, जो किसानों के लिए स्थिर आय का अच्छा स्रोत बन रही है। इसकी खास बात यह है कि इसे बिना ज्यादा रासायनिक खाद और कीटनाशकों के उगाया जाता है, जिससे इसकी गुणवत्ता और स्वाद बेहतर रहता है।
इंटरक्रॉपिंग, कम पानी की जरूरत, और स्थानीय तकनीकों के उपयोग से यह खेती न सिर्फ पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि किसानों के लिए जोखिम भी कम करती है। 90–120 दिनों में तैयार होने वाली यह फसल कम समय में अच्छा उत्पादन देती है और जरूरत से ज्यादा उत्पादन होने पर बाजार में भी अच्छी कीमत दिलाती है।
कुल मिलाकर, नवापुर तुअर की खेती पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक जरूरतों का एक बेहतरीन संतुलन है, जो किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ टिकाऊ खेती की दिशा में भी एक मजबूत कदम है।
