Cotton Farming Subsidy: पंजाब में कपास की खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सरकार द्वारा प्रमाणित बीजों पर 33 फीसदी तक सब्सिडी दी जा रही है, लेकिन इसके बावजूद किसानों का रुझान लगातार घटता नजर आ रहा है। इस वर्ष सब्सिडी योजना के तहत किसानों का पंजीकरण पिछले साल की तुलना में करीब 63 फीसदी कम दर्ज किया गया है। इतना ही नहीं, राज्य में कपास की बुवाई का कुल रकबा भी घटा है, जिससे कपास उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ गई है। Cotton Farming Subsidy

विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में बेमौसम बारिश, सिंचाई की अनियमित व्यवस्था, पिंक बॉलवर्म के बढ़ते प्रकोप और फसल को हुए भारी नुकसान के कारण किसानों का भरोसा कपास की खेती से कम हुआ है। कई किसान अब कम जोखिम वाली दूसरी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। हालांकि, कृषि विभाग और वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि Bollgard-III तकनीक और नई उन्नत कपास किस्मों के आने से भविष्य में किसानों का विश्वास फिर से बढ़ेगा और कपास की खेती का रकबा दोबारा बढ़ सकता है। Cotton Farming Subsidy
पंजाब सरकार लगातार कपास की खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को प्रोत्साहित कर रही है। इसी उद्देश्य से सरकार प्रमाणित कपास बीजों पर 33 प्रतिशत तक सब्सिडी भी दे रही है। इसके बावजूद किसानों का इस योजना के प्रति उत्साह काफी कम दिखाई दे रहा है। कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2026 में योजना के तहत केवल 19,000 किसानों ने पंजीकरण कराया, जबकि 2025 में यह संख्या करीब 52,000 थी। यानी एक साल में पंजीकरण में लगभग 63 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। Cotton Farming Subsidy

अधिकारियों का मानना है कि वर्ष 2021 से लगातार पिंक बॉलवर्म जैसे कीटों के हमले, बेमौसम बारिश, मौसम की अनिश्चितता और कई बार फसल खराब होने जैसी समस्याओं ने किसानों का कपास की खेती से भरोसा कमजोर किया है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में किसान अब कपास की बजाय दूसरी फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे राज्य में कपास के रकबे में भी लगातार कमी देखने को मिल रही है। Cotton Farming Subsidy
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पंजाब सरकार ने वर्ष 2023 में किसानों को कपास की खेती के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से प्रमाणित बीटी कॉटन हाइब्रिड और Punjab Agricultural University (PAU) द्वारा अनुशंसित देसी कपास बीजों पर 33 प्रतिशत सब्सिडी की शुरुआत की थी। यह लाभ प्रति किसान अधिकतम 5 एकड़ तक की खेती के लिए उपलब्ध कराया जाता है, ताकि किसानों का लागत बोझ कम हो और कपास का रकबा बढ़ाया जा सके। Cotton Farming Subsidy
हालांकि, सरकारी प्रयासों और सब्सिडी के बावजूद पंजाब के दक्षिण मालवा क्षेत्र में किसानों का कपास की खेती के प्रति रुझान लगातार घट रहा है। कभी इस अर्ध-शुष्क क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली कपास की खेती अब कई चुनौतियों का सामना कर रही है। बीते वर्षों में कीटों के बढ़ते प्रकोप, मौसम की अनिश्चितता और लगातार हुए फसल नुकसान के कारण बड़ी संख्या में किसान दूसरी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। आमतौर पर कपास की बुवाई अप्रैल महीने में की जाती है और फसल अक्टूबर तक तैयार हो जाती है, लेकिन घटते रकबे ने राज्य में कपास उत्पादन को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। Cotton Farming Subsidy

इस साल केवल 80,000 हेक्टेयर में हुई कपास की बुवाई
पंजाब कृषि विभाग के उप निदेशक (कपास) Charanjit Singh के अनुसार, वर्ष 2026 में राज्य में करीब 80,000 हेक्टेयर क्षेत्र में ही कपास की बुवाई हुई है। पिछले वर्ष यह रकबा लगभग 1.19 लाख हेक्टेयर था, यानी एक साल में कपास के क्षेत्रफल में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। Cotton Farming Subsidy
उन्होंने बताया कि पिछले एक महीने के दौरान हुई बेमौसम बारिश और प्रतिकूल मौसम ने कपास की फसल को प्रभावित किया है, जिससे आने वाले समय में कपास का कुल रकबा और घटने की आशंका है। कृषि विभाग को खेतों से जो शुरुआती आंकड़े मिले हैं, वे उत्साहजनक नहीं हैं। विभाग के अनुसार, केवल कपास का रकबा ही नहीं घटा है, बल्कि इस फसल की खेती करने वाले किसानों की संख्या में भी लगातार कमी दर्ज की जा रही है, जो राज्य में कपास उत्पादन के भविष्य के लिए चिंता का विषय है। Cotton Farming Subsidy
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बेमौसम बारिश और सिंचाई संकट से प्रभावित हुई कपास की बुवाई
पंजाब के प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्रों में अप्रैल के दौरान बुवाई के तुरंत बाद हुई बेमौसम बारिश ने किसानों की परेशानियां बढ़ा दीं। लगातार बारिश के कारण खेतों की ऊपरी सतह पर सख्त परत (क्रस्ट) बन गई, जिससे कपास के अंकुर मिट्टी से बाहर नहीं निकल सके। इसके चलते कई स्थानों पर पौधों का अंकुरण प्रभावित हुआ और बड़ी संख्या में पौधे शुरुआती अवस्था में ही नष्ट हो गए, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। Cotton Farming Subsidy
कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार, निर्धारित बुवाई अवधि समाप्त होने के बाद दोबारा बुवाई करना किसानों के लिए काफी महंगा साबित होता है। अतिरिक्त बीज, मजदूरी और अन्य कृषि खर्च बढ़ने के कारण अधिकांश किसानों ने पुनः बुवाई से दूरी बनाई। वहीं, बुवाई के समय नहरों की सफाई चलने के कारण सिंचाई के लिए समय पर पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं हो सका।
इसके अलावा, बठिंडा, मानसा और मुक्तसर जैसे प्रमुख कपास उत्पादक जिलों में छोटी सिंचाई नहरों के क्षतिग्रस्त होने से भी किसानों को पानी की कमी का सामना करना पड़ा, जिसका सीधा असर कपास की बुवाई और शुरुआती फसल विकास पर पड़ा। Cotton Farming Subsidy
देसी कपास की नई किस्म से बढ़ी उम्मीदें, लेकिन प्रचार की रही कमी
पंजाब के कृषि मंत्री Gurmeet Singh Khudian ने कहा कि कृषि विभाग देसी कपास की किस्म PBD-88 को किसानों के बीच अपेक्षित स्तर पर लोकप्रिय नहीं बना सका। उनके अनुसार, Punjab Agricultural University (PAU) द्वारा विकसित यह उन्नत किस्म कई प्रमुख कीटों के प्रति बेहतर प्रतिरोध क्षमता रखती है, कम श्रम और अपेक्षाकृत कम लागत में अच्छी पैदावार देने में सक्षम है। यदि इस किस्म का व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार किया जाए, तो यह राज्य में घटते कपास रकबे को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
कृषि विशेषज्ञों का भी मानना है कि पंजाब में कपास की खेती को दोबारा गति तभी मिलेगी, जब किसानों को गुलाबी सुंडी (पिंक बॉलवर्म) के खिलाफ अधिक प्रभावी नई पीढ़ी की जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) कपास किस्में उपलब्ध हों। साथ ही, Bollgard-III जैसी उन्नत तकनीकों और बेहतर बीज विकल्पों के व्यावसायिक उपयोग से भविष्य में किसानों का भरोसा फिर से बढ़ सकता है, जिससे कपास उत्पादन और खेती का रकबा दोनों में सुधार होने की उम्मीद है।
निष्कर्ष
पंजाब में कपास की खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार 33 प्रतिशत बीज सब्सिडी जैसी कई पहल कर रही है, लेकिन बेमौसम बारिश, सिंचाई संबंधी समस्याएं, पिंक बॉलवर्म का प्रकोप और लगातार फसल नुकसान जैसी चुनौतियों के कारण किसानों का भरोसा इस फसल से कम होता जा रहा है।
ऐसे में केवल सब्सिडी देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि किसानों को उन्नत और कीट-प्रतिरोधी किस्में, समय पर सिंचाई, प्रभावी तकनीकी सलाह और बेहतर बाजार सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी। यदि इन समस्याओं का समाधान किया जाता है, तो भविष्य में पंजाब में कपास की खेती का रकबा और उत्पादन दोनों फिर से बढ़ सकते हैं।
