Chana Ki Kheti: चना भारत की सबसे महत्वपूर्ण दलहनी फसलों में से एक है। इसकी खेती कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली मानी जाती है। चने में प्रोटीन, फाइबर और कई आवश्यक पोषक तत्व पाए जाते हैं, इसलिए इसकी बाजार में हमेशा अच्छी मांग रहती है। यदि किसान वैज्ञानिक तरीके से चना की खेती करें, तो प्रति हेक्टेयर बेहतर उत्पादन के साथ अच्छी आय प्राप्त कर सकते हैं। आइए जानते हैं चना की खेती की पूरी प्रक्रिया। Chana Ki Kheti
चना की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु और मिट्टी
चना मुख्य रूप से रबी मौसम की फसल है। इसकी अच्छी पैदावार के लिए ठंडी और शुष्क जलवायु सबसे उपयुक्त मानी जाती है। बीज अंकुरण के समय 20 से 25 डिग्री सेल्सियस तथा फसल की बढ़वार के दौरान 15 से 20 डिग्री सेल्सियस तापमान आदर्श रहता है।मिट्टी की बात करें तो अच्छी जल निकासी वाली दोमट, बलुई दोमट या काली मिट्टी चना की खेती के लिए सबसे बेहतर होती है। मिट्टी का pH मान 6.0 से 8.0 के बीच होना चाहिए। Chana Ki Kheti
चना की उन्नत किस्में
अधिक उत्पादन के लिए प्रमाणित एवं उन्नत किस्मों का चयन करना जरूरी है। किसान अपने क्षेत्र के अनुसार निम्न किस्मों का चुनाव कर सकते हैं।
- पूसा 372
- पूसा 256
- JG 11
- JG 14
- JAKI 9218
- GNG 1581
- RVG 202
- RSG 888
- BG 256
- HC 5
इन किस्मों में रोग प्रतिरोधक क्षमता अच्छी होती है और अधिक उत्पादन देने की क्षमता होती है। Chana Ki Kheti

चना की बुवाई का सही समय
उत्तर भारत में चने की बुवाई अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े से नवंबर के पहले सप्ताह तक करना सबसे उपयुक्त माना जाता है। समय पर बुवाई करने से पौधों का विकास अच्छा होता है और उत्पादन भी अधिक मिलता है। Chana Ki Kheti
खेत की तैयारी
अच्छी फसल के लिए खेत की 2 से 3 गहरी जुताई करें। इसके बाद पाटा लगाकर खेत को समतल बना लें। यदि संभव हो तो अंतिम जुताई के समय 8 से 10 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर मिलाएं। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। Chana Ki Kheti
बीज दर और बुवाई की विधि
चना की खेती में बीज की मात्रा किस्म पर निर्भर करती है।
- देसी चना: 60 से 75 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर
- काबुली चना: 90 से 110 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर
बुवाई लाइन से करें। पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 से 45 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 से 15 सेंटीमीटर रखें। बीज को 5 से 8 सेंटीमीटर गहराई पर बोना चाहिए।

बीज उपचार जरूर करें
बुवाई से पहले बीज का उपचार करना आवश्यक है। इससे फसल को शुरुआती रोगों से सुरक्षा मिलती है। बीज को फफूंदनाशी दवा से उपचारित करने के बाद राइजोबियम और पीएसबी (फॉस्फेट सॉल्युबिलाइजिंग बैक्टीरिया) कल्चर से उपचारित करें। इससे नाइट्रोजन स्थिरीकरण बेहतर होता है और उत्पादन बढ़ता है। Chana Ki Kheti
खाद एवं उर्वरक प्रबंधन
मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करना सबसे अच्छा रहता है। सामान्यतः प्रति हेक्टेयर निम्न मात्रा उपयोगी होती है।
- गोबर की सड़ी खाद: 8 से 10 टन
- नाइट्रोजन: 20 किलोग्राम
- फास्फोरस: 40 से 60 किलोग्राम
- पोटाश: 20 किलोग्राम (आवश्यकतानुसार)
- सल्फर: 20 किलोग्राम
संतुलित उर्वरक उपयोग से दानों की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों में वृद्धि होती है। Chana Ki Kheti
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चना की सिंचाई
चना कम पानी वाली फसल है। सामान्यतः 2 से 3 सिंचाई पर्याप्त रहती हैं।
- पहली सिंचाई शाखाएं निकलने के समय।
- दूसरी सिंचाई फूल आने के समय।
- तीसरी सिंचाई दाना बनने की अवस्था में (यदि आवश्यकता हो)।
अधिक सिंचाई से बचें क्योंकि इससे जड़ गलन और अन्य रोग बढ़ सकते हैं।
खरपतवार नियंत्रण
बुवाई के 25 से 30 दिन बाद पहली निराई-गुड़ाई करें। आवश्यकता अनुसार दूसरी निराई 45 दिन बाद करें। खेत को खरपतवार मुक्त रखने से पौधों को पर्याप्त पोषण मिलता है और उत्पादन बढ़ता है। Chana Ki Kheti
चना की खेती में प्रमुख रोग एवं कीट
उकठा (विल्ट) रोग
इस रोग से पौधे अचानक सूख जाते हैं। बचाव के लिए रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन करें और बीज उपचार अवश्य करें।
फली छेदक कीट
यह चने का सबसे हानिकारक कीट है जो फलियों में छेद कर दानों को नुकसान पहुंचाता है। नियमित निगरानी करें और आवश्यकता पड़ने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह अनुसार अनुशंसित कीटनाशकों का प्रयोग करें। Chana Ki Kheti
कटुआ कीट
यह पौधों को जमीन की सतह से काट देता है। समय पर निगरानी और उचित नियंत्रण उपाय अपनाने से नुकसान कम किया जा सकता है।
कटाई और मड़ाई
जब पौधों की पत्तियां पीली पड़ जाएं और फलियां पूरी तरह सूख जाएं, तब कटाई करें। कटाई के बाद फसल को 4 से 5 दिन धूप में सुखाकर मड़ाई करें। अच्छी तरह सूखे दानों को साफ करके भंडारण करें। Chana Ki Kheti
चना की खेती में संभावित उत्पादन
यदि किसान उन्नत तकनीकों का पालन करें, तो औसतन 18 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। उन्नत किस्मों और उचित प्रबंधन के साथ इससे अधिक उत्पादन भी संभव है। Chana Ki Kheti
चना की खेती से कमाई
चना की खेती में लागत अपेक्षाकृत कम होती है, जबकि बाजार में इसकी अच्छी मांग रहती है। यदि उत्पादन अच्छा हो और उचित बाजार मूल्य मिले, तो किसान प्रति हेक्टेयर अच्छा लाभ कमा सकते हैं। बेहतर गुणवत्ता वाले दानों का मूल्य सामान्य चने की तुलना में अधिक मिलता है।
चना की खेती के लिए महत्वपूर्ण सुझाव
- हमेशा प्रमाणित और उन्नत बीजों का ही चयन करें।
- बुवाई से पहले बीज उपचार अवश्य करें।
- समय पर बुवाई करें।
- मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करें।
- फली छेदक कीट और रोगों की नियमित निगरानी करें।
- आवश्यकता से अधिक सिंचाई न करें।
- कटाई के बाद दानों को अच्छी तरह सुखाकर ही भंडारण करें।
निष्कर्ष
चना की खेती कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली प्रमुख दलहनी फसल है। यदि किसान सही समय पर बुवाई, उन्नत किस्मों का चयन, संतुलित खाद एवं उर्वरकों का उपयोग, समय पर सिंचाई और रोग-कीटों का वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाते हैं, तो प्रति हेक्टेयर बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। आधुनिक कृषि तकनीकों और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार खेती करने से चना की फसल की गुणवत्ता बढ़ती है और किसानों की आय में भी अच्छी बढ़ोतरी हो सकती है।
