Maize Farming: पंजाब के लुधियाना सहित कई इलाकों में किसानों का रुझान तेजी से ग्रीष्मकालीन मक्का (Summer Maize) की खेती की ओर बढ़ रहा है। हालांकि, कृषि वैज्ञानिक और जल विशेषज्ञ इस प्रवृत्ति को भूजल संरक्षण के लिए चिंताजनक मान रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रीष्मकालीन मक्का की फसल को पूरे सीजन में 12 से 15 बार सिंचाई की आवश्यकता होती है, जिससे भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन होता है और पहले से गिर रहे भूजल स्तर पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। Maize Farming
इसके बावजूद बड़ी संख्या में किसान इस फसल को अपना रहे हैं। इसकी मुख्य वजह मक्का की कम अवधि में तैयार होने वाली फसल, डेयरी उद्योग में साइलेज (हरे चारे) की बढ़ती मांग, बेहतर बाजार मूल्य और पारंपरिक फसलों की तुलना में अधिक मुनाफे की संभावना है। किसानों का मानना है कि अच्छी कीमत और मजबूत मांग के कारण उन्हें आर्थिक रूप से अधिक लाभ मिलता है, जबकि वैज्ञानिक लगातार जल संरक्षण को ध्यान में रखते हुए कम पानी वाली फसलों और सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को अपनाने की सलाह दे रहे हैं। Maize Farming
कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के बावजूद नहीं बदल रहा किसानों का रुझान
पंजाब के लुधियाना में कृषि वैज्ञानिकों और कृषि विभाग की लगातार अपील के बावजूद किसान ग्रीष्मकालीन (समर) मक्का की खेती छोड़ने को तैयार नहीं हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह फसल गर्मियों के दौरान अत्यधिक सिंचाई मांगती है, जिससे भूजल का तेजी से दोहन होता है। ऐसे में जिले में लगातार गिरते भूजल स्तर को लेकर चिंता एक बार फिर बढ़ गई है।
जिला कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2026 में ग्रीष्मकालीन और स्प्रिंग मक्का की खेती करीब 15,500 हेक्टेयर क्षेत्र में की गई है। पिछले वर्ष यह रकबा लगभग 16,000 हेक्टेयर था। अधिकारियों का कहना है कि क्षेत्रफल में आई यह मामूली गिरावट किसानों की खेती की पसंद में किसी बड़े बदलाव का संकेत नहीं देती। यानी अधिकांश किसान अब भी इस फसल को लाभदायक मानते हुए इसकी खेती जारी रखे हुए हैं। Maize Farming
कृषि विभाग लंबे समय से किसानों को खरीफ मक्का अपनाने के लिए जागरूक कर रहा है। विभाग का तर्क है कि खरीफ मौसम में होने वाली बारिश के कारण इस फसल को अपेक्षाकृत कम सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है, जिससे भूजल की बचत होती है। यही वजह है कि इसे धान जैसी अधिक पानी वाली फसलों का बेहतर विकल्प माना जाता है। Maize Farming

हालांकि, बेहतर बाजार मांग, कम अवधि में तैयार होने वाली फसल और साइलेज की बढ़ती जरूरत के कारण बड़ी संख्या में किसान अब भी ग्रीष्मकालीन मक्का को प्राथमिकता दे रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि गर्मियों में इस फसल की सिंचाई के लिए बड़ी मात्रा में भूमिगत जल का उपयोग किया जाता है, जिससे पहले से संकट झेल रहे भूजल स्तर पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इसलिए वैज्ञानिक किसानों से जल संरक्षण को ध्यान में रखते हुए कम पानी वाली फसलें अपनाने और आधुनिक सिंचाई तकनीकों का उपयोग करने की अपील कर रहे हैं।
ग्रीष्मकालीन मक्का के लिए 12–15 सिंचाई, बढ़ रहा भूजल पर दबाव
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रीष्मकालीन (समर) मक्का की फसल को खरीफ मक्का की तुलना में काफी अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है। गर्मी के मौसम में पर्याप्त वर्षा नहीं होने के कारण इस फसल को पूरे सीजन में 12 से 15 बार सिंचाई करनी पड़ती है। यही वजह है कि इसकी खेती से भूमिगत जल का दोहन तेजी से बढ़ रहा है और राज्य के लगातार घटते भूजल भंडार पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। Maize Farming
लुधियाना के मुख्य कृषि अधिकारी गुरदीप सिंह ने हिन्दुस्तान टाइम्स से बातचीत में बताया कि कृषि विभाग लगातार किसानों को ग्रीष्मकालीन मक्का की अधिक पानी की आवश्यकता और इसके भूजल पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में जागरूक कर रहा है। विभाग किसानों से कम पानी वाली फसलों और खरीफ मक्का जैसी वैकल्पिक खेती अपनाने की अपील भी कर रहा है, ताकि जल संसाधनों का संरक्षण किया जा सके। Maize Farming

हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि ग्रीष्मकालीन मक्का की खेती पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं है। इसलिए यदि कोई किसान इस फसल की खेती करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई करने या जुर्माना लगाने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। ऐसे में कृषि विभाग किसानों को केवल जागरूकता अभियान और तकनीकी सलाह के माध्यम से जल संरक्षण के प्रति प्रेरित करने का प्रयास कर रहा है। Maize Farming
कब की जाती है ग्रीष्मकालीन मक्का की खेती?
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) की प्रमुख मक्का वैज्ञानिक एवं मक्का अनुसंधान समूह की प्रमुख सुरिंदर कौर संधू के अनुसार, ग्रीष्मकालीन (समर) मक्का की बुवाई आमतौर पर मई और जून के सबसे गर्म महीनों में की जाती है। इस दौरान तापमान अधिक होने और प्राकृतिक वर्षा लगभग न होने के कारण फसल की पानी की जरूरत काफी बढ़ जाती है। यही कारण है कि किसानों को पूरी फसल अवधि में बार-बार सिंचाई करनी पड़ती है, जिससे भूजल का अधिक दोहन होता है। Maize Farming
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कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान ग्रीष्मकालीन मक्का की जगह कम पानी वाली फसलों या खरीफ सीजन में उगाई जाने वाली फसलों को अपनाएं, तो भूजल संरक्षण में काफी मदद मिल सकती है। इससे राज्य के सीमित जल संसाधनों पर बढ़ता दबाव भी कम होगा और भविष्य में जल संकट से निपटना आसान हो सकेगा। Maize Farming
ग्रीष्मकालीन मक्का में 12–15 सिंचाई, खरीफ मक्का में केवल 2–3 बार
विशेषज्ञों के अनुसार, ग्रीष्मकालीन मक्का की फसल को पूरे सीजन में 12 से 15 बार सिंचाई की आवश्यकता होती है, जबकि खरीफ मक्का में बारिश का लाभ मिलने के कारण सामान्यतः केवल 2 से 3 सिंचाई ही पर्याप्त होती हैं। यही वजह है कि समर मक्का की खेती भूजल संसाधनों पर कहीं अधिक दबाव डालती है। Maize Farming
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) की वैज्ञानिक सुरिंदर कौर संधू ने बताया कि पिछले दो-तीन वर्षों में कई किसानों ने गेहूं–ग्रीष्मकालीन मक्का–धान का फसल चक्र अपनाया है। उनका कहना है कि यह खेती का तरीका जल संसाधनों के लिहाज से टिकाऊ नहीं माना जा सकता, क्योंकि धान की फसल को भी करीब 150 से 160 सेंटीमीटर पानी की आवश्यकता होती है।
ऐसे में पहले समर मक्का के लिए अत्यधिक सिंचाई और उसके बाद धान की पानी-प्रधान खेती, दोनों मिलकर पंजाब के पहले से तेजी से घटते भूजल भंडार पर भारी दबाव डाल रहे हैं। इसी कारण कृषि वैज्ञानिक किसानों को जल संरक्षण को ध्यान में रखते हुए कम पानी वाली फसलों और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने की लगातार सलाह दे रहे हैं। Maize Farming
किसान क्यों कर रहे हैं ग्रीष्मकालीन मक्का की खेती?
कृषि विशेषज्ञों की चेतावनी के बावजूद बड़ी संख्या में किसान ग्रीष्मकालीन (समर) मक्का की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यह फसल कम समय में तैयार हो जाती है और बाजार में इसकी अच्छी मांग बनी रहती है। खासकर इससे तैयार होने वाले साइलेज (हरा पशु चारा) की डेयरी क्षेत्र में लगातार बढ़ती मांग के कारण किसानों को अपनी उपज बेचने में किसी तरह की परेशानी नहीं होती। बेहतर बाजार, आसान बिक्री और आकर्षक मुनाफे के चलते किसान इस फसल को आर्थिक रूप से लाभदायक विकल्प मान रहे हैं।
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) की मक्का वैज्ञानिक सुरिंदर कौर संधू ने बताया कि किसानों को ग्रीष्मकालीन मक्का की खेती से होने वाले भूजल दोहन के प्रति जागरूक करने के लिए विश्वविद्यालय के विस्तार विभाग द्वारा लगातार प्रशिक्षण कार्यक्रम, किसान गोष्ठियां और जागरूकता शिविर आयोजित किए जा रहे हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों को कम पानी वाली फसलों, टिकाऊ कृषि पद्धतियों और जल संरक्षण के महत्व के बारे में जानकारी दी जा रही है।
हालांकि, इन जागरूकता अभियानों के बावजूद किसानों का रुझान अभी भी समर मक्का की ओर बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि कम अवधि में अच्छी आमदनी, साइलेज की बढ़ती मांग और सुनिश्चित बाजार जैसे आर्थिक कारण किसानों के निर्णय को अधिक प्रभावित कर रहे हैं। यही वजह है कि जल संरक्षण की सलाह मिलने के बाद भी बड़ी संख्या में किसान ग्रीष्मकालीन मक्का की खेती जारी रखे हुए हैं।
