Baby Corn Farming: पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) ने किसानों से पारंपरिक धान की खेती के साथ-साथ बेबी कॉर्न को एक बेहतर और लाभदायक विकल्प के रूप में अपनाने की अपील की है। विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि बेबी कॉर्न की फसल केवल 60–65 दिनों में तैयार हो जाती है, जिससे किसान कम समय में अच्छी आमदनी प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा इस फसल में धान की तुलना में पानी की आवश्यकता काफी कम होती है, जिससे जल संरक्षण के साथ खेती की लागत भी घटती है। Baby Corn Farming
विशेषज्ञों के अनुसार, देश और विदेश दोनों बाजारों में बेबी कॉर्न की मांग लगातार बढ़ रही है। इसका उपयोग होटल, रेस्टोरेंट, फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री और निर्यात में बड़े पैमाने पर किया जाता है, जिससे किसानों को बेहतर कीमत मिलने की संभावना रहती है। Baby Corn Farming
इसी को देखते हुए पीएयू ने किसानों को बेबी कॉर्न जैसी कम अवधि और अधिक लाभ देने वाली फसलों को अपनाने की सलाह दी है। साथ ही, जहां धान की खेती आवश्यक हो, वहां कम अवधि में तैयार होने वाली उन्नत धान किस्मों की बुवाई करने की भी सिफारिश की गई है, ताकि पानी की बचत हो और खेती अधिक टिकाऊ बन सके। Baby Corn Farming
Baby Corn Farming
फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) ने किसानों को पारंपरिक धान की खेती के साथ-साथ बेबी कॉर्न की खेती अपनाने की सलाह दी है। विश्वविद्यालय के कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि कम अवधि में तैयार होने वाली यह फसल किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ पानी की बचत और खेती को अधिक लाभदायक बनाने में भी मदद कर सकती है। Baby Corn Farming

विशेष रूप से शहरों और बड़े बाजारों के आसपास खेती करने वाले किसानों के लिए बेबी कॉर्न एक बेहतरीन व्यावसायिक फसल बनकर उभर रही है, क्योंकि इसकी मांग होटल, रेस्टोरेंट, सुपरमार्केट और फूड प्रोसेसिंग उद्योगों में लगातार बढ़ रही है। Baby Corn Farming
पीएयू के अनुसार, बेबी कॉर्न की फसल केवल 60 से 65 दिनों में तैयार हो जाती है, जिससे किसान कम समय में अपनी उपज बेचकर जल्दी आय प्राप्त कर सकते हैं। इसकी एक और खासियत यह है कि भुट्टे की तुड़ाई के बाद बचा हरा पौधा पशुओं के लिए पौष्टिक हरे चारे के रूप में उपयोग किया जा सकता है। इससे डेयरी व्यवसाय से जुड़े किसानों को अतिरिक्त लाभ मिलता है और चारे पर होने वाला खर्च भी कम होता है। Baby Corn Farming
विश्वविद्यालय का कहना है कि बेबी कॉर्न पंजाब की फसल विविधीकरण योजना के लिए एक उपयुक्त विकल्प है। इसकी कम अवधि के कारण किसान गेहूं और बासमती धान की फसलों के बीच एक अतिरिक्त फसल आसानी से ले सकते हैं। वहीं, अप्रैल से सितंबर के दौरान एक पारंपरिक धान की फसल के स्थान पर बेबी कॉर्न की दो से तीन फसलें उगाई जा सकती हैं। इससे खेत का बेहतर उपयोग, सिंचाई के पानी की बचत, उत्पादन लागत में कमी और किसानों की कुल आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी संभव है। Baby Corn Farming
बेबी कॉर्न अब किसानों के लिए तेजी से उभरती हुई नकदी फसल बनती जा रही है। बढ़ती बाजार मांग और बेहतर कीमत मिलने के कारण इसकी खेती किसानों के लिए लाभ का सौदा साबित हो रही है। द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) का कहना है कि घरेलू बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बेबी कॉर्न की मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे किसानों को अपनी उपज बेचने के अधिक अवसर मिल रहे हैं। Baby Corn Farming

पहले भारत में बेबी कॉर्न की आपूर्ति मुख्य रूप से थाईलैंड जैसे देशों से आयात के जरिए होती थी और इसका उपयोग बड़े होटल, रेस्तरां और फूड प्रोसेसिंग उद्योग तक सीमित था। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में भारत में इसकी खेती का दायरा तेजी से बढ़ा है। आज बेबी कॉर्न की मांग होटल, एयरलाइंस, कैटरिंग कंपनियों, शिपिंग सेक्टर और यूरोपीय देशों के निर्यात बाजारों में लगातार बढ़ रही है। Baby Corn Farming
पीएयू के अनुसार, कई निजी कंपनियां किसानों के साथ कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के माध्यम से बेबी कॉर्न की खेती को बढ़ावा दे रही हैं। इससे किसानों को पहले से तय बाजार, बेहतर दाम और फसल बेचने की सुविधा मिल रही है। बढ़ती मांग, कम अवधि में तैयार होने वाली फसल और बेहतर विपणन संभावनाओं के कारण बेबी कॉर्न किसानों की आय बढ़ाने वाली एक लाभदायक फसल के रूप में तेजी से लोकप्रिय हो रही है। Baby Corn Farming
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क्या होता है बेबी कॉर्न?
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) के अनुसार, बेबी कॉर्न मक्का का कोमल और अपरिपक्व भुट्टा होता है, जिसे रेशे (सिल्क) निकलने के दो से तीन दिन के भीतर तोड़ लिया जाता है। इस अवस्था में भुट्टा पूरी तरह विकसित नहीं होता, लेकिन खाने के लिए सबसे अधिक कोमल, स्वादिष्ट और पौष्टिक माना जाता है। Baby Corn Farming
चूंकि यह विकास के दौरान पत्तियों से पूरी तरह ढका रहता है, इसलिए इस पर कीटों और बीमारियों का प्रकोप अपेक्षाकृत कम होता है। यही कारण है कि इसकी खेती में कीटनाशकों का इस्तेमाल भी कम करना पड़ता है, जिससे यह सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण फसल मानी जाती है। Baby Corn Farming
प्रति एकड़ कितना होता है उत्पादन?
बेहतर उत्पादन के लिए पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ने अपनी विकसित सिंगल-क्रॉस हाइब्रिड किस्म ‘पंजाब बेबी कॉर्न-1’ की सिफारिश की है। यह किस्म एक समान आकार और गुणवत्ता वाले भुट्टे देती है तथा प्रति एकड़ लगभग 8.4 क्विंटल बिना छिलके वाला बेबी कॉर्न उत्पादन देने की क्षमता रखती है। विश्वविद्यालय के अनुसार, इसकी बुवाई अप्रैल से अगस्त के पहले सप्ताह तक की जा सकती है। वहीं, उच्च गुणवत्ता और बेहतर बाजार भाव के लिए रेशे निकलने के दो से तीन दिन के भीतर ही भुट्टों की तुड़ाई करने की सलाह दी गई है।
पोषण से भरपूर और बाजार में बढ़ती मांग
पीएयू का कहना है कि बेबी कॉर्न केवल किसानों के लिए लाभदायक फसल ही नहीं, बल्कि पोषण के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण है। इसमें प्रोटीन, विटामिन, कैल्शियम, आयरन और फॉस्फोरस जैसे आवश्यक पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।
इसके अलावा इसमें कार्बोहाइड्रेट कम, फाइबर अधिक और वसा (फैट) लगभग नहीं के बराबर होती है, जिससे यह स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों की पहली पसंद बनता जा रहा है। यही वजह है कि होटल, रेस्तरां, फूड प्रोसेसिंग उद्योग और निर्यात बाजार में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे किसानों को बेहतर कीमत और अधिक मुनाफा मिलने की संभावना भी बढ़ जाती है।
पंजाब में गर्मी और कम बारिश बनी चिंता
पंजाब में लगातार बढ़ रही गर्मी, सामान्य से कम बारिश और भूजल स्तर में गिरावट को देखते हुए पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) ने किसानों को मौसम की चुनौतियों के प्रति सतर्क रहने की सलाह दी है। विश्वविद्यालय का मानना है कि बदलते मौसम के कारण खरीफ सीजन में फसलों पर असर पड़ सकता है, इसलिए किसानों को समय रहते वैज्ञानिक सलाह के अनुसार खेती की योजना बनानी चाहिए।
पीएयू के कुलपति डॉ. सतबीर सिंह गोसल ने कृषि वैज्ञानिकों को निर्देश दिए हैं कि वे अधिक से अधिक किसानों के संपर्क में रहें और उन्हें खरीफ सीजन के दौरान आने वाली संभावित समस्याओं से बचाव के लिए जागरूक करें। उन्होंने कहा कि अत्यधिक गर्मी और कम वर्षा के कारण धान की रोपाई में देरी हो सकती है, जिससे फसल उत्पादन प्रभावित होने के साथ-साथ कीट एवं रोगों का प्रकोप बढ़ने की आशंका भी रहती है।
इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए डॉ. गोसल ने वैज्ञानिकों से पीएयू द्वारा विकसित और अनुशंसित कम अवधि में तैयार होने वाली तथा कम पानी की आवश्यकता वाली धान की किस्मों को किसानों के बीच अधिक से अधिक बढ़ावा देने को कहा है। उनका मानना है कि ऐसी किस्मों को अपनाने से पानी की बचत होगी, खेती की लागत कम होगी और बदलते मौसम में भी किसानों को बेहतर उत्पादन प्राप्त करने में मदद मिलेगी।
