हरियाणा के कपास उत्पादक जिलों में गुलाबी सुंडी (Pink Bollworm) के शुरुआती लक्षण मिलने के बाद कृषि विभाग ने किसानों को सतर्क रहने की सलाह दी है। Kapas Me Pink Bollworm Ki Pehchan Aur Niyantran Kaise Kare यह सवाल इस समय हजारों किसानों के मन में है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में इस कीट ने कपास की फसल को भारी नुकसान पहुंचाया था। समय पर निगरानी और वैज्ञानिक उपाय अपनाकर किसान अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं।
हरियाणा के कपास क्षेत्रों में बढ़ा पिंक बॉलवर्म का खतरा
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तहत क्षेत्रीय एकीकृत कीट प्रबंधन केंद्र (फरीदाबाद) और संयुक्त निदेशक कृषि (कपास), सिरसा की टीम ने हाल ही में सिरसा जिले सहित कई क्षेत्रों का संयुक्त सर्वे किया। निरीक्षण के दौरान कुछ खेतों में गुलाबी सुंडी के शुरुआती हमले के संकेत मिले।विशेषज्ञों का कहना है कि Kapas Me Pink Bollworm Ki Pehchan Aur Niyantran Kaise Kare इसकी सही जानकारी होने पर किसान शुरुआती अवस्था में ही कीट पर नियंत्रण कर सकते हैं और उत्पादन में होने वाले नुकसान को काफी हद तक रोक सकते हैं।
Kapas Me Pink Bollworm Ki Pehchan Aur Niyantran Kaise Kare? पहचान ऐसे करें
गुलाबी सुंडी का हमला शुरू होने पर कुछ सामान्य लक्षण दिखाई देते हैं। कपास की टिंडियों में छोटे-छोटे छेद बनना, अंदर गुलाबी रंग की सुंडी दिखाई देना, रुई का सही विकास न होना और टिंडियों का समय से पहले खुलना इसके प्रमुख संकेत हैं।यदि खेत में ऐसे लक्षण दिखाई दें तो किसान तुरंत कृषि विभाग या कृषि वैज्ञानिकों से संपर्क करें। Kapas Me Pink Bollworm Ki Pehchan Aur Niyantran Kaise Kare इसकी जानकारी समय पर मिलने से फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है।
फेरोमोन ट्रैप से करें नियमित निगरानी
कृषि विभाग ने किसानों को प्रति एकड़ 4 से 5 फेरोमोन ट्रैप लगाने की सलाह दी है। इन ट्रैप में कॉटन फेरोमोन ल्योर का उपयोग किया जाता है, जिससे पिंक बॉलवर्म की गतिविधियों की समय रहते जानकारी मिल जाती है।इसके अलावा रस चूसने वाले कीटों की निगरानी के लिए प्रति हेक्टेयर 20 पीले या नीले स्टिकी ट्रैप लगाने की भी सिफारिश की गई है। Kapas Me Pink Bollworm Ki Pehchan Aur Niyantran Kaise Kare इसका सबसे प्रभावी तरीका नियमित निगरानी और समय पर कार्रवाई माना जाता है।
कई जिलों में लगाए गए डेमो प्लॉट
हरियाणा के सिरसा, फतेहाबाद, हिसार, हांसी, भिवानी, चरखी दादरी और जींद जिलों में फेरोमोन ट्रैप आधारित डेमो प्लॉट लगाए गए हैं। कृषि अधिकारियों के अनुसार जिन किसानों ने पहले से इन ट्रैप का उपयोग किया है, उन्हें गुलाबी सुंडी पर नियंत्रण में बेहतर परिणाम मिले हैं।इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि Kapas Me Pink Bollworm Ki Pehchan Aur Niyantran Kaise Kare इसके लिए आधुनिक निगरानी तकनीकों को अपनाना बेहद जरूरी है।
केवल मंजूरशुदा कीटनाशकों का करें उपयोग
कृषि विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि वे केवल CIBRC (Central Insecticides Board & Registration Committee) से मंजूर कीटनाशकों का ही प्रयोग करें।कीटनाशकों का छिड़काव तभी करें जब खेत में कीटों की संख्या Economic Threshold Level (ETL) से अधिक हो। इससे अनावश्यक खर्च कम होगा और पर्यावरण पर भी कम प्रभाव पड़ेगा। Kapas Me Pink Bollworm Ki Pehchan Aur Niyantran Kaise Kare इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा सही समय पर सही दवा का चयन भी है।
NPSS मोबाइल ऐप से मिलेगी रियल टाइम जानकारी
किसानों को नेशनल पेस्ट सर्विलांस सिस्टम (NPSS) मोबाइल ऐप का उपयोग करने की भी सलाह दी गई है। इस ऐप के माध्यम से किसान कीटों की पहचान, रोगों की जानकारी और उनके नियंत्रण के उपाय तुरंत प्राप्त कर सकते हैं।विशेषज्ञों के अनुसार Kapas Me Pink Bollworm Ki Pehchan Aur Niyantran Kaise Kare इसका सबसे आसान तरीका नियमित फसल निरीक्षण और NPSS ऐप के माध्यम से मिलने वाली वैज्ञानिक सलाह का पालन करना है।
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पिछले वर्षों में हुआ था भारी नुकसान
कृषि अधिकारियों के अनुसार वर्ष 2023, 2024 और 2025 में सिरसा सहित हरियाणा के कई कपास उत्पादक जिलों में पिंक बॉलवर्म ने किसानों को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचाया था। इसी अनुभव को देखते हुए इस बार विभाग पहले से निगरानी अभियान चला रहा है।
इस बार बारिश भी बनी चुनौती
इस वर्ष लगातार हो रही बारिश के कारण कई क्षेत्रों में जलभराव की स्थिति बनी हुई है, जिससे कपास की फसल प्रभावित हुई है। विशेषज्ञों ने किसानों को खेतों में जल निकासी की उचित व्यवस्था करने और नियमित रूप से फसल का निरीक्षण करने की सलाह दी है।
यदि किसान Kapas Me Pink Bollworm Ki Pehchan Aur Niyantran Kaise Kare जैसी वैज्ञानिक सलाह का पालन करते हैं, फेरोमोन ट्रैप लगाते हैं, केवल मंजूरशुदा कीटनाशकों का उपयोग करते हैं और समय-समय पर फसल की निगरानी करते हैं, तो वे पिंक बॉलवर्म के प्रकोप से अपनी कपास की फसल को काफी हद तक सुरक्षित रख सकते हैं। इससे उत्पादन में सुधार होगा और आर्थिक नुकसान की संभावना भी कम होगी।
