राजस्थान के पश्चिमी जिलों में Rajasthan Mein Jeere Ki Nai Kheti Takneek किसानों की आय बढ़ाने का नया माध्यम बन रही है। जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) की पहल के तहत रेजिड्यू फ्री जीरे की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस तकनीक से तैयार जीरे को बाजार में सामान्य जीरे की तुलना में करीब 25 प्रतिशत अधिक कीमत मिल रही है। बेहतर गुणवत्ता, कम उत्पादन लागत और निर्यात बाजार में बढ़ती मांग के कारण यह मॉडल किसानों के लिए लाभदायक साबित हो रहा है।
क्या है Rajasthan Mein Jeere Ki Nai Kheti Takneek?
Rajasthan Mein Jeere Ki Nai Kheti Takneek का उद्देश्य किसानों को ऐसी वैज्ञानिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित करना है, जिससे जीरे में हानिकारक कीटनाशक अवशेष न रहें। इस पहल को जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) की वित्तपोषित बायोटेक-किसान हब फॉर द वेस्टर्न ड्राई रीजन परियोजना के तहत शुरू किया गया है। इस परियोजना को साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर (SABC), जोधपुर और आईसीएआर-राष्ट्रीय बीज मसाला अनुसंधान केंद्र (NRCSS), अजमेर द्वारा संयुक्त रूप से लागू किया गया है।इस मॉडल में किसानों को एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) और गुड एग्रीकल्चरल प्रैक्टिसेज (GAP) के अनुसार खेती करने का प्रशिक्षण दिया जाता है, जिससे सुरक्षित और उच्च गुणवत्ता वाला जीरा तैयार होता है।
किसानों को मिला प्रशिक्षण और आधुनिक खेती का लाभ
Rajasthan Mein Jeere Ki Nai Kheti Takneek के तहत वर्ष 2019 से 2024 के बीच पश्चिमी राजस्थान के प्रमुख जीरा उत्पादक जिलों में किसानों को आधुनिक खेती की ट्रेनिंग दी गई। उन्हें खेतों पर प्रदर्शन के माध्यम से IPM तकनीक की जानकारी दी गई और गुणवत्तापूर्ण कृषि इनपुट तथा पौध संरक्षण उत्पाद उपलब्ध कराए गए।परियोजना के अंतर्गत किसान उत्पादक संगठनों (FPO) के माध्यम से मसाला कंपनियों और निर्यातकों के साथ बाय-बैक व्यवस्था भी बनाई गई, जिससे किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए बेहतर बाजार उपलब्ध हुआ।
IPM तकनीक से लागत घटी और बढ़ा मुनाफा
विशेषज्ञों के अनुसार Rajasthan Mein Jeere Ki Nai Kheti Takneek अपनाने से फफूंद और कीटों का प्रभाव काफी कम हुआ है। इसके कारण किसानों की प्रति एकड़ खेती की लागत 25 से 35 प्रतिशत तक घट गई है। वहीं बेहतर गुणवत्ता वाले जीरे के लिए किसानों को औसतन 24 से 25 प्रतिशत अधिक कीमत प्राप्त हुई है।IPM आधारित खेती किसानों की रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम करती है और सुरक्षित उत्पादन को बढ़ावा देती है। इससे घरेलू बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी राजस्थान के जीरे की मांग बढ़ रही है।
35 हजार टन उत्पादन, अब 1 लाख टन का लक्ष्य
वर्तमान में Rajasthan Mein Jeere Ki Nai Kheti Takneek के जरिए राजस्थान में लगभग 35 हजार टन रेजिड्यू फ्री जीरे का उत्पादन हो रहा है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में इस उत्पादन को बढ़ाकर 1 लाख टन तक पहुंचाया जा सकता है।यदि यह लक्ष्य हासिल होता है, तो राजस्थान देश का सबसे बड़ा रेजिड्यू फ्री जीरा उत्पादक क्षेत्र बन सकता है और किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिलेगी।
निर्यात बाजार में बढ़ रही है रेजिड्यू फ्री जीरे की मांग
यूरोप, अमेरिका, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में रेजिड्यू फ्री और उच्च गुणवत्ता वाले जीरे की मांग लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि Rajasthan Mein Jeere Ki Nai Kheti Takneek के जरिए तैयार होने वाला जीरा अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों पर खरा उतरता है, जिससे निर्यात की संभावनाएं लगातार मजबूत हो रही हैं।यदि मसाला कंपनियां और निर्यातक इस मॉडल को बड़े स्तर पर अपनाते हैं, तो राजस्थान गुणवत्ता वाले जीरे के निर्यात का प्रमुख केंद्र बन सकता है।
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मसाला बोर्ड और उद्योग से सहयोग की जरूरत
आईसीएआर-राष्ट्रीय बीज मसाला अनुसंधान केंद्र (NRCSS), अजमेर के विशेषज्ञों का कहना है कि IPM आधारित जैव उत्पाद प्रभावी साबित हुए हैं। अब इस मॉडल को बड़े स्तर पर लागू करने के लिए मसाला बोर्ड, निजी कंपनियों, उद्योग जगत और अनुसंधान संस्थानों के सहयोग की आवश्यकता है। इससे अधिक किसानों को Rajasthan Mein Jeere Ki Nai Kheti Takneek से जोड़कर उनकी आय बढ़ाई जा सकती है।
रेजिड्यू फ्री जीरे की खेती क्यों है खास?
Rajasthan Mein Jeere Ki Nai Kheti Takneek के तहत वैज्ञानिक तरीकों से जीरे की खेती की जाती है। इसमें रसायनों का उपयोग केवल आवश्यकता और निर्धारित मानकों के अनुसार किया जाता है, ताकि कटाई के समय तक फसल में किसी प्रकार के हानिकारक कीटनाशक अवशेष न रहें। इससे जीरे की गुणवत्ता बेहतर होती है और किसानों को घरेलू बाजार के साथ-साथ निर्यात बाजार में भी अधिक कीमत मिलती है।यही कारण है कि पश्चिमी राजस्थान के किसान तेजी से Rajasthan Mein Jeere Ki Nai Kheti Takneek को अपना रहे हैं। बेहतर उत्पादन, कम लागत, सुरक्षित खेती और प्रीमियम बाजार भाव के कारण यह तकनीक आने वाले समय में जीरा उत्पादकों के लिए आय बढ़ाने का मजबूत विकल्प बन सकती है।
