भारत की कृषि परंपरा दुनिया की सबसे समृद्ध कृषि विरासतों में से एक मानी जाती है। बदलते जलवायु परिस्थितियों, नई कृषि चुनौतियों और आधुनिक खेती के बढ़ते प्रभाव के बीच सरकार अब देशी बीजों और पारंपरिक फसल किस्मों के संरक्षण पर विशेष ध्यान दे रही है। इसी दिशा में Ek Lakh Se Jyada Desi Kismen Surakshit रखने का महत्वपूर्ण कार्य किया गया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (NBPGR) और केंद्र सरकार की कई योजनाओं के माध्यम से देशभर की पारंपरिक फसल किस्मों को सुरक्षित रखा जा रहा है, ताकि भविष्य में किसानों को बेहतर बीज, अधिक उत्पादन और जलवायु परिवर्तन से लड़ने वाली नई किस्में उपलब्ध कराई जा सकें।
Ek Lakh Se Jyada Desi Kismen Surakshit करने में ICAR और NBPGR की बड़ी भूमिका
भारत में देशी बीजों और पारंपरिक फसलों के संरक्षण का सबसे बड़ा दायित्व भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (NBPGR) निभा रहे हैं। ये संस्थान देश के अलग-अलग राज्यों से पारंपरिक बीजों का संग्रह करते हैं, उनका वैज्ञानिक परीक्षण करते हैं और उन्हें राष्ट्रीय जीन बैंक में सुरक्षित रखते हैं। Ek Lakh Se Jyada Desi Kismen Surakshit होने के पीछे इन संस्थानों का वर्षों का शोध और संरक्षण कार्य शामिल है। इन किस्मों में ऐसी विशेषताएं मौजूद हैं जो सूखा, बाढ़, कीट और बदलते मौसम जैसी परिस्थितियों में भी बेहतर प्रदर्शन करने की क्षमता रखती हैं।
किसानों की पारंपरिक किस्मों को मिल रही कानूनी पहचान
सरकार पौध किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण (PPV&FR) अधिनियम, 2001 के तहत किसानों द्वारा विकसित पारंपरिक किस्मों को कानूनी पहचान प्रदान कर रही है। 15 जुलाई 2026 तक 5346 किसान किस्मों का पंजीकरण किया जा चुका है। यह कदम किसानों के अधिकारों की सुरक्षा के साथ-साथ Ek Lakh Se Jyada Desi Kismen Surakshit रखने के राष्ट्रीय अभियान को भी मजबूती देता है। इससे किसानों को अपनी पारंपरिक किस्मों का संरक्षण और उपयोग करने का अधिकार मिलता है।
राष्ट्रीय जीन बैंक में सुरक्षित हैं एक लाख से अधिक देशी किस्में
देश की कृषि जैव विविधता को सुरक्षित रखने के लिए राष्ट्रीय जीन बैंक लगातार विस्तार कर रहा है। ICAR-NBPGR के अनुसार राष्ट्रीय जीन बैंक में अब तक Ek Lakh Se Jyada Desi Kismen Surakshit की जा चुकी हैं। इनमें धान, गेहूं, मक्का, दालें, तिलहन, सब्जियां और बागवानी फसलों की अनेक स्थानीय किस्में शामिल हैं। इन संरक्षित बीजों का उपयोग भविष्य में नई और अधिक उत्पादक फसल किस्में विकसित करने के लिए किया जाएगा।
पारंपरिक बीजों को बचाने वाले किसानों को मिल रहा सम्मान
सरकार उन किसानों और समुदायों को सम्मानित भी कर रही है जो वर्षों से देशी बीजों का संरक्षण कर रहे हैं। पादप जीनोम संरक्षक पुरस्कार योजना के तहत अब तक 45 सामुदायिक पुरस्कार, 69 कृषक पुरस्कार और 88 कृषक मान्यता प्रदान की जा चुकी है। इन प्रयासों का उद्देश्य किसानों को प्रेरित करना है ताकि Ek Lakh Se Jyada Desi Kismen Surakshit रखने का अभियान और अधिक मजबूत हो सके।
पारंपरिक बीज उत्पादन के लिए मिल रही आर्थिक सहायता
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन (NFSNM) के तहत सरकार किसानों को पारंपरिक बीज उत्पादन, बीज वितरण, प्रशिक्षण और सामुदायिक बीज बैंक स्थापित करने के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध करा रही है। इससे किसानों को गुणवत्तापूर्ण देशी बीज आसानी से मिल रहे हैं और Ek Lakh Se Jyada Desi Kismen Surakshit रखने की प्रक्रिया को गति मिल रही है। यह पहल भविष्य की टिकाऊ खेती के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
मखाना, लीची और मिलेट जैसे पारंपरिक उत्पादों को मिल रहा बढ़ावा
सरकार प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (PMFME) के तहत एक जिला एक उत्पाद (ODOP) अभियान को बढ़ावा दे रही है। इसके माध्यम से मखाना, शाही लीची, जर्दालू आम, मिलेट और अन्य स्थानीय कृषि उत्पादों की प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और ब्रांडिंग को प्रोत्साहित किया जा रहा है। पारंपरिक कृषि उत्पादों को बाजार से जोड़ने के साथ-साथ Ek Lakh Se Jyada Desi Kismen Surakshit रखने का उद्देश्य भी इस पहल से जुड़ा हुआ है।
GI टैग और श्री अन्न मिशन से बढ़ रही किसानों की आय
देश के कई पारंपरिक कृषि उत्पादों को GI टैग देकर उनकी अलग पहचान बनाई जा रही है। वहीं अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष 2023 के बाद सरकार श्री अन्न यानी मिलेट को भी लगातार बढ़ावा दे रही है। हैदराबाद स्थित ICAR-भारतीय मिलेट्स शोध संस्थान (IIMR) को वैश्विक उत्कृष्टता केंद्र बनाया गया है। इन पहलों से Ek Lakh Se Jyada Desi Kismen Surakshit रखने के साथ-साथ किसानों को बेहतर बाजार और अधिक आय के अवसर भी मिल रहे हैं।
देशी फसलों पर लगातार हो रहा वैज्ञानिक शोध
ICAR-IARI, DBT और DST के सहयोग से गेहूं, धान, मक्का, तिल, मसूर, खीरा और टमाटर जैसी प्रमुख फसलों की देशी किस्मों पर लगातार शोध किया जा रहा है। वैज्ञानिक ऐसी नई किस्में विकसित कर रहे हैं जो अधिक उत्पादन देने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन, रोग और कीटों का बेहतर सामना कर सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि Ek Lakh Se Jyada Desi Kismen Surakshit होने से भविष्य की कृषि और अधिक सुरक्षित एवं टिकाऊ बनेगी।
बागवानी खेती के लिए पॉलीहाउस सब्सिडी और आधुनिक तकनीक से बढ़ेगी किसानों की आय
सामुदायिक बीज बैंक बचा रहे हैं कृषि विरासत
देशभर में लगभग 50 सामुदायिक बीज बैंक स्थापित किए गए हैं, जहां 25 से अधिक फसलों की हजारों पारंपरिक किस्मों का संरक्षण किया जा रहा है। ये बीज बैंक किसानों को देशी बीजों का आदान-प्रदान करने और स्थानीय जैव विविधता को बनाए रखने में मदद कर रहे हैं। इस पहल से Ek Lakh Se Jyada Desi Kismen Surakshit रखने का लक्ष्य और अधिक मजबूत हो रहा है।
सरकार का लक्ष्य पारंपरिक खेती को बनाना आत्मनिर्भर
सरकार का मानना है कि देशी बीज केवल कृषि उत्पादन का माध्यम नहीं बल्कि भारत की कृषि विरासत और खाद्य सुरक्षा की मजबूत नींव हैं। बीज संरक्षण, वैज्ञानिक अनुसंधान, किसानों को आर्थिक सहायता, सामुदायिक बीज बैंक, GI टैग और स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग जैसे प्रयासों के माध्यम से Ek Lakh Se Jyada Desi Kismen Surakshit रखने का अभियान लगातार आगे बढ़ रहा है। आने वाले वर्षों में यह पहल किसानों की आय बढ़ाने, कृषि जैव विविधता को सुरक्षित रखने और भारत की पारंपरिक खेती को नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
