Garmiyo Me Mirch Ki Kheti Kese Kare
Garmiyo Me Mirch Ki Kheti Kese Kare भारत में सब्जियों से लेकर खाने-पीने के अनेकों पकवानों में तीखापन लाने के लिए मिर्च का उपयोग किया जाता है। खास बात यह है कि भारत पूरे वैश्विक खपत का अकेले 36 फीसदी मिर्ची का उत्पादन करता है। भारत की मिर्च की माँग दुनिया भर में रहती है जिसके चलते किसानों को मिर्च के अच्छे भाव मिल जाते हैं यानि की किसानों के लिए मिर्च की खेती एक मुनाफे का सौदा है। खासकर गर्मियों में अपने ख़ाली खेतों में किसान इसे लगाकर अतिरिक्त आमदनी कर सकते हैं।Garmiyo Me Mirch Ki Kheti Kese Kare
भारत में हरी और लाल मिर्च दोनों के लिए की जाती है। इसकी खेती के लिए 15 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त माना जाता है। 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान होने पर इसके फूल एवं फल गिरने लगते हैं। मिर्च की खेती सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है। अच्छे जल निकास वाली एवं कार्बनिक युक्त बलुई-लाल दोमट मृदा जिसका पी.एच. मान 6.0 से 7.5 हो इसकी खेती के लिए सबसे उपयुक्त होती है।Garmiyo Me Mirch Ki Kheti Kese Kare

मिर्च की खेती के लिए जलवायु
- मिर्च की खेती के लिए आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती हैं, मिर्च की खेती के लिए 15 से 35 डिग्री तापमान की आवश्यकता होती हैं।
- इसकी खेती के लिए रात्रि का तापमान 16 से 21 डिग्री होना आवश्यक होता हैं इस तापमान में अच्छे फल बनते हैं।
भूमि की तैयारी
- भूमि को 2-3 बार जुताई करके भुरभुरी (fine tilth) बनाई जानी चाहिए। अंतिम जुताई के समय खेत में गोबर की खाद (FYM) मिलानी चाहिए।
- मेड़ और नालियां (ridges and furrows) 45-60 सेमी की दूरी पर तैयार की जाती हैं।
- पौधों को समतल भूमि पर सिंचाई के लिए उपयुक्त आकार के प्लॉट्स में प्रतिरोपित किया जाता है। Garmiyo Me Mirch Ki Kheti Kese Kare
ग्रीष्मकालीन मिर्च की नर्सरी कब एवं कैसे डालें?
गर्मी में मिर्च की खेती के लिए फरवरी-मार्च में पौधशाला में बीजों की बुआई करनी चाहिए। एक हेक्टेयर पौध तैयार करने के लिए संकर प्रजातिओं के लिए 250 ग्राम और अन्य किस्मों के लिये एक से डेढ़ किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है। नर्सरी के लिए 1 मीटर चौड़ी, 3 मीटर लंबी और 10 से 15 से.मी. ज़मीन से उठी हुई क्यारियाँ तैयार करनी चाहिए।किसान बीजों की बुआई से पहले बविस्टीन या कैप्टान की 2 ग्राम/ किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें। पौधशाला में कीटों की रोकथाम हेतु 2 ग्राम फोरेट 10 वर्गमीटर की दर से जमीन में मिलाएँ या मिथाइल डिमेटोन 1 मि.ली./लीटर पानी या एसीफ़ेट 1 मि.ली./ लीटर पानी का पौधों पर छिड़काव करें।
भूमि की तैयारी
- भूमि को 2-3 बार जुताई करके भुरभुरी (fine tilth) बनाई जानी चाहिए। अंतिम जुताई के समय खेत में गोबर की खाद (FYM) मिलानी चाहिए।
- मेड़ और नालियां (ridges and furrows) 45-60 सेमी की दूरी पर तैयार की जाती हैं।
- पौधों को समतल भूमि पर सिंचाई के लिए उपयुक्त आकार के प्लॉट्स में प्रतिरोपित किया जाता है।
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बुवाई
ऊँची क्यारियों पर मिर्च की नर्सरी
- 1.0-1.5 किलोग्राम बीज तीन सेंट क्षेत्र में बोया जाता है, जिससे एक हेक्टेयर के लिए पर्याप्त पौध तैयार हो सके।
- आमतौर पर 40-45 दिन पुरानी पौधों को खेत में प्रतिरोपित किया जाता है।
- प्रतिरोपण से लगभग 10 दिन पहले शिमला मिर्च और मिर्च के पौधों की शीर्ष कली काटने (clipping) से पार्श्व कली (axillary buds) की वृद्धि तेज होती है और शाखाएं अधिक फैलती हैं।
मिर्च में कितना खाद डालें
नर्सरी में बुआई के 4-5 सप्ताह बाद पौध रोपण के लिए तैयार हो जाती है। गर्मी की फसल में पंक्ति से पंक्ति व पौधों से पौधों की दूरी 60X 30-45 सेंटीमीटर रखनी चाहिए । जायद मिर्च रोपाई हेतु प्रति हेक्टेयर 70 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 से 60 किलोग्राम फास्फोरस एवं 50 से 60 किलोग्राम पोटाश खेत में अंतिम जुताई के समय मिला दें। शेष बची हुई आधी मात्रा 30 व 45 दिनों के बाद टॉप ड्रेसिंग के द्वारा खेत में डालें एवं तुरंत सिंचाई कर दें। Garmiyo Me Mirch Ki Kheti Kese Kare
सिंचाई कैसे करे
समय पर सिंचाई करना फल बनने और उनके विकास के लिए आवश्यक होता है।
– गर्मी के मौसम में हर तीसरे या चौथे दिन सिंचाई की जरूरत होती है।
– सर्दियों में सिंचाई का अंतराल 7-8 दिन का होना चाहिए।
– कतारों में लगाए गए फसलों के लिए ड्रिप सिंचाई लाभकारी होती है, जिससे खाद भी आसानी से दी जा सकती है।
निराई-गुड़ाई
मिर्च की फसल में सभी अंतर-सांस्कृतिक क्रियाओं (intercultural operations) का उद्देश्य मिट्टी में नमी बनाए रखना, खरपतवार हटाना और मिट्टी को हवा प्रदान करना होता है।
– जब पौधे स्थापित हो जाते हैं, तो पहली गुड़ाई शुरू कर दी जाती है।
– प्रारंभिक अवस्था में, उथली गुड़ाई (shallow hoeing) की जाती है, ताकि खरपतवार हटाए जा सकें और मिट्टी की नमी सुरक्षित रखी जा सके।
– बाद की अवस्था में, गहरी गुड़ाई (deep hoeing) की जाती है, जिसमें मिट्टी चढ़ाना (earthing up) और मेड़-नाली बनाना (ridges and furrows) शामिल है।
– खरपतवार नियंत्रण के लिए हाथ से निराई-गुड़ाई के साथ-साथ खरपतवारनाशी (herbicides) का उपयोग भी किया जाता है।

