Kese Kre Parval Ki Kheti परवल की खेती करने का सही तरीका

Kese Kre Parval Ki Kheti परवल की खेती करने का सही तरीका

Kese Kre Parval Ki Kheti आपने कई सब्जियों के नाम सुने होंगे और इनका जायका भी लिया होगा? उन्हीं में से एक है परवल। परवल का उपयोग सब्जी के रूप में किया जाता है। यह सब्जी देखने में तो छोटी है, लेकिन सेहत के लिए इसके बड़े फायदे हैं। परवल भारत की बहुत ही प्रचलित सब्जी है। परवल की खेती गर्म एवं तर जलवायु वाले क्षेत्रो में अच्छी तरह से की जाती है। इसको ठंडे क्षेत्रो में बहुत कम उगाया जाता है। परवल की उपज एक वर्ष में 80 से 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से होती है। इसकी उपज इसके बोने के तरीके पर निर्भर है। Kese Kre Parval Ki Kheti

Kese Kre Parval Ki Kheti

परवल की खेती आज के समय में उन किसानों के लिए किसी लॉटरी से कम नहीं है. जो कम मेहनत और छोटे निवेश में बड़ी सफलता पाना चाहते हैं. अक्सर हम पारंपरिक फसलों के चक्कर में पड़े रहते हैं. लेकिन परवल एक ऐसी नकदी फसल है जिसकी डिमांड मंडियों में हमेशा बनी रहती है. इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि एक बार सही तरीके से बेल लगा दी जाए.तो यह कई महीनों तक लगातार फल देती रहती है. Kese Kre Parval Ki Kheti

परवल क्या है?

परवल का वैज्ञानिक नाम ट्राइकोसेन्थेस डायोइका रोक्सब है। इसे पॉइंटिड गोल्ड के नाम से भी जाना जाता है। यह पौधों के कुकुरबिटास परिवार से संबंध रखता है। यह एक बेल वाली सब्जी की फसल है। परवल का सब्जियों में विशिष्ट स्थान है। इसके फल सुपाच्य होते हैं। शरीर के परिसंचारण तंत्र को बबल प्रदान करते है। कई शोधों में पाया गया कि परवल में कई औषधीय गुण पाये जाते हैं। Kese Kre Parval Ki Kheti

परवल के औषधीय गुण में एंटीहाइपरग्लाइसेमिक (रक्त में ग्लूकोज के स्तर को कम करने वाला गुण), एंटीहाइपरलिपिडेमिक (कोलेस्ट्रॉल कम करने वाला गुण), एंटीट्यूमर, एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीडायरियल (दस्त के लक्षणों से राहत देने वाला गुण) शामिल हैं। ये सभी गुण सेहत के लिए कई प्रकार से फायदेमंद हो सकते हैं और कई बीमारियों के लक्षण को भी कम कर सकते हैं। Kese Kre Parval Ki Kheti

परवल की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु

परवल की खेती के लिए गर्म एवं अधिक आर्द्रता वाली जलवायु उपयुक्त होती है। परवल की खेती वहां अच्छी पैदावार देती है जहां औसत वार्षिक वर्षा 100 से 120 सेंमी. हो। इसके अलावा तापक्रम 5 डिग्री सेल्सियस से कम नहीं होना चाहिए। लेकिन जहां सिंचाई की सुविधा न हो, वहाँ भी परवल की खेती सफलतापूर्वक होती है। इसके अलावा सर्दियों के मौसम में इसकी खेती को नहीं किया जा सकता है, क्योकि इसके पौधे सर्दियों में गिरने वाले पाले को सहन नहीं कर सकते। Kese Kre Parval Ki Kheti

परवल की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी एवं तापमान

परवल की खेती के लिए गर्म जलवायु अच्छी मानी जाती है। परवल की खेती गर्म एवं तर जलवायु वाले क्षेत्रो में अच्छी तरह से की जाती है। परवल की खेती के लिए उचित जल निकास वाली जीवांशयुक्त रेतीली या दोमट भूमि सर्वोत्तम मानी गई हैं क्योंकि इसकी लताएँ पानी के रुकाव को सहन नही कर पाती हैं।  इसकी खेती के लिए भूमि का पीएच मान भी सामान्य होना चाहिए। अत: ऊंचे स्थानों पर जहाँ जल निकास की उचित व्यवस्था हो वहीं पर इसकी खेती करनी चाहिए।

इसके बीजो को अंकुरित होने के लिए सामान्य तापमान की आवश्यकता होती है। परवल के फलों के बीज, शल्क और जड़ो के ठीक तरह से अंकुरण के लिए 20 से 25 डिग्री तापमान की आवश्यकता होती है। अधिकतम व न्यूनतम तापमान पैदावार को प्रभावित करता है। Kese Kre Parval Ki Kheti

खेत की तैयारी

मई-जून के महीनों में मिट्टी पलटने वाले हल से खेत को एकबार जुताई कर खुला छोड़ देना चाहिए ताकि हानिकारक कीड़े-मकोड़े मर जायें तथा खरपतवार सुख जायें। लत्तर की रोपाई के लगभग एक महीना पहले मिट्टी में गोबर की सड़ी खाद अथवा कम्पोस्ट 200-250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से अच्छी तरह मिला देना चाहिए। लत्तर रोपाई के समय खेत को 3-4 बार देशी हल से जुताई करके पाटा चलाकर मिट्टी को भुरभुरा तथा समतल बना लेना आवश्यक है।

रोपाई का समय एवं विधि

रोपाई का समय भिन्न-भिन्न स्थानों पर अलग-अलग होता है। मैदानी भागों में परवल की रोपनी का उचित समय मध्य जुलाई से अक्टूबर तक और दियारा क्षेत्रों में सितम्बर से अक्टूबर तक होता है।

परवल में अलग-अलग पौधों पर नर और मादा फूल उत्पन्न होते हैं। नर पुष्पों से फल नहीं बनते हैं बल्कि वे मादा पुष्पों में परागण का कार्य करते हैं जिसमें मादा पुष्पों से फल बनना सम्भव होता है। नर पुष्प बड़े और सफेद होते हैं, जबकि मादा पुष्प थोड़ा छोटा और सफेद होता है, उसके नीचे गर्भाश्य जुड़ा रहता है जो कुछ दिनों में परागण के बाद बढ़कर फल बन जाता है। इसका विस्तार लताओं या बेलों द्वारा किया जाता है। परवल लगाने के समय नर और मादा पौधों का अनुपात 1:19 होना अनिवार्य है।

उपरोक्त अनुपात नहीं रहने पर उत्पादन में काफी कमी हो जाती है। खेत में कतार से कतार की दूरी 2.5 मीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 1.5 मीटर रखना चाहिए साथ ही थल्ले, भूमि की सतह से 6-8 सेंमी. ऊँचाई पर बनाने चाहिए। एक वर्ष पुरानी लताओं से 120-150 सेंमी. लम्बे टुकड़े काटकर इस प्रकार मोड़ना चाहिए कि लच्छी की लम्बाई 30 सेंमी. हो जाये तथा 10 सेंमी. गहरे थालों में इस प्रकार लगाया जाय कि दोनों सिरे ऊपर खुले रहें।

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खाद एवं उर्वरक

प्रति थाला 3-4 किलोग्राम कम्पोस्ट, 250 ग्राम अंडी की खल्ली, 10 ग्राम यूरिया, 100 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 25 ग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश एवं 25 ग्राम एलड्रीन धूल 10 प्रतिशत मिट्टी में मिलाकर भर देना चाहिए। जिस मिट्टी में चूना की कमी हो उसमें प्रति थाला 100 ग्राम चूना अवश्य मिला देना चाहिए।

एस प्रकार थाला भरकर 10 दिन तक छोड़ देना चाहिए। फरवरी के मध्य में प्रति थाला 20 ग्राम यूरिया का उपरिवेशन तथा मार्च माह के अंत में प्रति वाला यूरिया के बदले 35 ग्राम कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेड का व्यवहार करना चाहिए। उर्वरकों के प्रयोग के बाद सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। Kese Kre Parval Ki Kheti

निकाई-गुड़ाई

रोपनी के बाद और फल लगने के समय तक 4-5 बार निकाई-गुड़ाई करनी चाहिए ताकि लताओं की शाकीय वृद्धि तेजी से हो। लताओं के बढ़ जाने पर इसकी अनावश्यक वृद्धि को रोकने के लिए बार-बार लताओं को हाथ से उलटते-पलटते रहना चाहिए। ऐसा करने से गांठों से जड़ें निकलकर जमीन में प्रवेश नहीं कर पाती है और फलन अधिक होता है।

मचान बनाना या सहारा देना

फरवरी माह में जब पौधों में नये कल्ले फूटने लगते हैं तब मचान बनाने का काम शुरू कर देना चाहिए। परवल के दो कतारों के बीच 2 मी. चौड़ाई में 2-2 मी. की दूरी खम्बे गाड़ते हैं। जमीन की सतह से 1-1.25 मीटर की ऊँचाई पर बांस को लम्बाई-चौड़ाई और बीच में इस प्रकार सुतली से बांधते हैं कि मचान के रूप में बन जाये। मचान के ऊपर अरहर के डंठलों को फैलाकर सुतली से बाँध देना चाहिए।

प्रत्येक कतार के साथ 50 सेंमी. खाली स्थान रास्ता छोड़ना चाहिए ताकि दवा का छिड़काव, निकाई-गुड़ाई, सिंचाई तथा फलों की तुड़ाई आदि कृषि क्रियाओं को आसानी-पूर्वक किया जा सके। लताओं को मचान पर अरहर के डंठलों के सहारे चढ़ाना चाहिए। मचान मजबूत बनाना चाहिए ताकि वर्षा ऋतु में गिरने न पाये। Kese Kre Parval Ki Kheti

फलों की तुड़ाई

साधारणत: मार्च माह के मध्य से पौधों पर फल लगना शुरू हो जाता है। प्रारम्भ में फल लगने के 10-12 दिनों के बाद फल तोड़ने लायक हो जाते हैं। इस प्रकार मार्च एवं अप्रैल माह में फलों की तोडनी प्रति सप्ताह एक बार तथा मई में प्रति सप्ताह दो बार अवश्य करनी चाहिए। फलों की तोड़ाई मुलायम एवं हरी अवस्था में सूर्योदय से पहले करनी चाहिए। इससे फल अधिक समय तक ताजे बने रहते हैं।

ऊपज

अनुशंसित किस्मों को उन्नत तौर-तरीके से लगाकर प्रथम वर्ष औसतन 75-90 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और अलग तीन-चार वर्षो तक 175-200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक फलों की उपज प्राप्त की जा सकती है। दियारा क्षेत्रों में परवल की पैदावार बाढ़ आने के समय पर निर्भर करती है। यदि बाढ़ अगस्त के मध्य में आयी हो तो औसतन ऊपज 175-200 क्विंटल/हें. प्राप्त होती है। यदि बाढ़ का समय जुलाई माह के मध्य होता है, तो औसतन उपज 80-90 क्विंटल प्रति हेक्टेयर ही सीमित रह जाती है। पान के साथ परवल की मिश्रित खेती करने पर फसलों की औसत उपज एक चौथाई ही प्राप्त होती है परन्तु फलों की गुणवत्ता उच्च कोटि की होती है। Kese Kre Parval Ki Kheti

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लताओं की कटाई-छटाई

अक्टूबर-नवम्बर में जब पौधों पर फल लगना बंद हो जाता है, तब लताओं को जमीन की सतह से 20-25 सेंमी. तक छोड़कर शेष उपरी भाग को काट देना चाहिए। ऐसा करने से शेष भाग से नई शाखाएँ निकलती है। ये शाखाएँ पुन: मार्च से फल देना शुरू कर देती है। Kese Kre Parval Ki Kheti

लागत एवं मुनाफा

परवल की एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में खेती करने से सभी मदों पर लगभग 20,000/- रूपये का खर्च पड़ता है। यदि कुल 100 क्विंटल परवल की उपज हो जिसे कम से कम 500/- रूपये प्रति क्विंटल की दर से बेचा जाये तो कुल 50,000/- रूपये की आमदनी होती है। इसमें से लागत खर्च के बीस हजार रूपये की शुद्ध आमदनी प्रति हेक्टेयर होती है। इस प्रकार एक रूपये लागत पर परवल की खेती से 1.50 रूपये की शुद्ध प्राप्त होती है।

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