मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के गाडरवारा की Parali Se Kamai Success Story of Sohil Mansuri in MP यह बताती है कि खेती से निकलने वाले कृषि अवशेषों को सही तकनीक और बाजार से जोड़कर किस तरह कमाई का जरिया बनाया जा सकता है। डमरू घाटी के युवा उद्यमी सोहिल मंसूरी ने पराली को समस्या मानने के बजाय इससे बायोमास पेलेट तैयार करने का काम शुरू किया है। उनकी पहल से किसानों को अतिरिक्त आय, युवाओं को रोजगार और पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को कम करने की दिशा में नई राह मिली है।
पराली को समस्या नहीं, संसाधन बनाया
फसल कटाई के बाद खेतों में बड़ी मात्रा में पराली और दूसरे कृषि अवशेष बच जाते हैं। कई जगह किसान इन अवशेषों को खेत में ही जला देते हैं। इससे वायु प्रदूषण बढ़ने के साथ मिट्टी के जैविक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है। सोहिल मंसूरी ने इसी समस्या को अवसर में बदलने का प्रयास किया और कृषि अवशेषों के वैज्ञानिक इस्तेमाल की दिशा में कदम बढ़ाया। उनकी Parali Se Kamai Success Story of Sohil Mansuri in MP किसानों के लिए इसलिए खास है, क्योंकि इसमें पराली को जलाने के बजाय उसका व्यावसायिक उपयोग करने का मॉडल सामने आया है। Parali Se Kamai Success Story of Sohil Mansuri in MP
पंजाब की यात्रा से मिला बिजनेस आइडिया
करीब तीन साल पहले सोहिल मंसूरी पंजाब की यात्रा पर गए थे। वहां उन्होंने देखा कि फसल कटाई के बाद बचने वाले कृषि अवशेषों से बायोमास पेलेट तैयार किए जा रहे हैं। इससे उन्हें समझ आया कि खेतों में बेकार दिखाई देने वाली पराली ऊर्जा उत्पादन के लिए उपयोगी कच्चा माल बन सकती है। पंजाब से लौटने के बाद सोहिल ने बायोमास पेलेट के उत्पादन, तकनीक और बाजार की संभावनाओं के बारे में जानकारी जुटाई। उन्होंने पाया कि इन पेलेट का इस्तेमाल ताप विद्युत संयंत्रों में कोयले के विकल्प के रूप में किया जा सकता है। इसके बाद विशेषज्ञों और संबंधित विभागों से मार्गदर्शन लेकर उन्होंने अपने क्षेत्र में इस काम को शुरू करने का फैसला किया। Parali Se Kamai Success Story of Sohil Mansuri in MP
ग्रीन इंडियो बायोफ्यूल्स की शुरुआत
सोहिल मंसूरी ने कृषि अवशेषों के इस्तेमाल के लिए ग्रीन इंडियो बायोफ्यूल्स इकाई की स्थापना की। यहां धान की पराली, गन्ने की पत्तियों और अन्य कृषि अवशेषों को एकत्र करके उन्हें प्रोसेस किया जाता है। प्रसंस्करण के बाद इन अवशेषों से बायोमास पेलेट तैयार किए जाते हैं। इन पेलेट का इस्तेमाल ऊर्जा उत्पादन में किया जा सकता है और ताप विद्युत संयंत्रों में इन्हें कोयले के विकल्प के तौर पर उपयोग किया जाता है। इस तरह खेतों में जलने वाली पराली अब एक उपयोगी संसाधन में बदल रही है। Parali Se Kamai Success Story of Sohil Mansuri in MP
सरकारी योजना से मिला आर्थिक सहयोग
सोहिल मंसूरी के इस उद्यम को मध्य प्रदेश शासन की MP MSME Development Policy और एग्री इंफ्रा योजना के तहत 40 प्रतिशत वित्तीय सहायता मिली। सरकारी सहयोग से कृषि अवशेषों के संग्रहण, प्रसंस्करण और बायोमास पेलेट उत्पादन को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने में मदद मिली। यह मॉडल दिखाता है कि सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर युवा कृषि क्षेत्र से जुड़े नए व्यवसाय शुरू कर सकते हैं और ग्रामीण इलाकों में रोजगार के अवसर भी पैदा कर सकते हैं। Parali Se Kamai Success Story of Sohil Mansuri in MP
किसानों को पराली से अतिरिक्त आय का अवसर
इस पहल को जमीन पर उतारने के लिए सोहिल और उनकी टीम ने किसानों के बीच जागरूकता अभियान चलाया। किसानों को बताया गया कि फसल कटाई के बाद बची पराली को जलाने के बजाय उसे उपयोगी कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। कृषि अवशेषों को खेतों से इकट्ठा करने के लिए किसानों को बेलर मशीन उपलब्ध कराने में भी सहयोग किया गया। इससे पराली और दूसरे अवशेषों को एकत्र करके प्लांट तक पहुंचाना आसान हुआ। अब किसानों के लिए खेतों में बचने वाली पराली सिर्फ निपटान की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि इससे अतिरिक्त आमदनी का अवसर भी तैयार हो रहा है। Parali Se Kamai Success Story of Sohil Mansuri in MP
बायोमास पेलेट से स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा
कृषि अवशेषों से तैयार बायोमास पेलेट ऊर्जा उत्पादन के लिए उपयोगी हैं। इनका इस्तेमाल ताप विद्युत संयंत्रों में कोयले के साथ या उसके विकल्प के रूप में किया जा सकता है। कृषि अवशेषों का इस तरह उपयोग होने से एक तरफ पराली जलाने की जरूरत कम हो सकती है, वहीं दूसरी तरफ ऊर्जा क्षेत्र के लिए वैकल्पिक बायोमास ईंधन उपलब्ध होता है। यही कारण है कि सोहिल मंसूरी की पहल को कृषि और पर्यावरण दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। Parali Se Kamai Success Story of Sohil Mansuri in MP
पराली जलाने से प्रदूषण कम करने की पहल
पराली जलाने से निकलने वाला धुआं वायु प्रदूषण की समस्या को बढ़ा सकता है। इसके अलावा खेत में आग लगाने से मिट्टी के जैविक स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। अगर कृषि अवशेषों को खेत से निकालकर उनका वैज्ञानिक उपयोग किया जाए तो नरवाई जलाने की घटनाओं को कम करने में मदद मिल सकती है। सोहिल मंसूरी का मॉडल इसी दिशा में एक स्थानीय समाधान प्रस्तुत करता है। Parali Se Kamai Success Story of Sohil Mansuri in MP
8 से 10 युवाओं को मिला रोजगार
ग्रीन इंडियो बायोफ्यूल्स की पहल का फायदा केवल किसानों तक सीमित नहीं है। इस इकाई के माध्यम से क्षेत्र के करीब 8 से 10 युवाओं को रोजगार मिला है। कृषि अवशेषों के संग्रहण से लेकर उनके परिवहन, प्रसंस्करण और पेलेट उत्पादन तक कई स्तरों पर स्थानीय लोगों के लिए काम के अवसर तैयार हो रहे हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल सकती है।
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कचरे को संसाधन मानने की जरूरत
सोहिल मंसूरी का मानना है कि कृषि अवशेषों को कचरा समझने के बजाय संसाधन के रूप में देखने की जरूरत है। अगर किसानों को सही तकनीक, उचित बाजार और संग्रहण की सुविधा मिले तो पराली जलाने जैसी समस्या को व्यवसाय के अवसर में बदला जा सकता है। Parali Se Kamai Success Story of Sohil Mansuri in MP इसी सोच का उदाहरण है, जहां खेतों में बेकार समझी जाने वाली पराली को ऊर्जा उत्पादन के लिए उपयोगी बनाया जा रहा है। Parali Se Kamai Success Story of Sohil Mansuri in MP
कलेक्टर ने की पहल की सराहना
Parali Se Kamai Success Story of Sohil Mansuri in MP नरसिंहपुर कलेक्टर रजनी सिंह ने ग्रीन इंडियो बायोफ्यूल्स इकाई का निरीक्षण किया। उन्होंने कृषि अवशेषों के वैज्ञानिक उपयोग की इस पहल की सराहना की और इसे पर्यावरण संरक्षण, किसानों की आय बढ़ाने तथा स्थानीय रोजगार सृजन की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास बताया। उन्होंने इस तरह के प्रयासों को जिले के अन्य युवाओं के लिए भी प्रेरणादायक बताया।
गाडरवारा से निकला बड़ा संदेश
गाडरवारा की यह पहल दिखाती है कि कृषि अवशेषों को सही तरीके से एकत्र करके उनका वैज्ञानिक और व्यावसायिक उपयोग किया जाए तो पराली को आय, ऊर्जा और रोजगार के अवसर में बदला जा सकता है। सोहिल मंसूरी की कहानी सिर्फ एक युवा उद्यमी की सफलता नहीं, बल्कि कृषि कचरे को देखने की सोच में बदलाव की कहानी भी है। जिस पराली को किसान पहले समस्या समझकर जला देते थे, वही अब उपयोगी संसाधन बन सकती है। Parali Se Kamai Success Story of Sohil Mansuri in MP किसानों और युवाओं को यह संदेश देती है कि पराली को जलाने के बजाय उसका सही इस्तेमाल करके कमाई और रोजगार का नया रास्ता तैयार किया जा सकता है।
