Prakritik Kheti Se Bhindi Ki Kheti: बलिया में कृषि छात्रों ने प्राकृतिक खेती का एक अनोखा प्रयोग किया है। निधरिया स्थित कृषि फार्म पर बिना रासायनिक खाद, उर्वरक और कीटनाशक के भिंडी की खेती की जा रही है। इस प्रयोग की खास बात यह है कि करीब एक साल पहले लगाई गई भिंडी की फसल की एक बार कटाई होने के बाद पौधे दोबारा अपने आप उग आए और अब उनमें फिर से फूल और फल आने लगे हैं। Prakritik Kheti Se Bhindi Ki Kheti का यह प्रयोग कृषि छात्रों को प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल को समझने का अवसर दे रहा है।
बिना रासायनिक खाद के हो रही भिंडी की खेती
निधरिया स्थित कृषि फार्म पर Prakritik Kheti Se Bhindi Ki Kheti का प्रयोग किया जा रहा है। इस खेती में किसी भी प्रकार की रासायनिक खाद, उर्वरक या कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। खेत में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते हुए फसल को तैयार किया जा रहा है। इस खेती का उद्देश्य छात्रों को यह समझाना है कि फसल उत्पादन के लिए प्राकृतिक संसाधनों का किस तरह बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है। यहां खेती के दौरान मिट्टी और फसल के प्राकृतिक वातावरण को बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
एक साल बाद भी पौधों में आ रहे फूल और फल
इस प्रयोग की सबसे खास बात भिंडी के पौधों का दोबारा उगना है। कृषि छात्रों के अनुसार, करीब एक साल पहले भिंडी की फसल लगाई गई थी। फसल की एक बार कटाई होने के बाद पौधे दोबारा अपने आप उग आए। इसके बाद खेत में दोबारा भिंडी की बुवाई नहीं करनी पड़ी। अब इन पौधों में फूल आने के साथ भिंडी के फल भी दिखाई दे रहे हैं। Prakritik Kheti Se Bhindi Ki Kheti के इस प्रयोग से छात्रों को फसल के प्राकृतिक विकास को करीब से समझने का अवसर मिल रहा है।
पेड़-पौधों की पत्तियों से मिल रहा पोषण
इस प्राकृतिक खेती में पेड़-पौधों से गिरने वाली पत्तियों का इस्तेमाल किया जा रहा है। खेत में गिरने वाली पत्तियां धीरे-धीरे सड़कर जैविक पदार्थ में बदलती हैं, जिससे मिट्टी में प्राकृतिक रूप से पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिलती है। कृषि विशेषज्ञों के नेतृत्व में छात्र इस प्रक्रिया को समझ रहे हैं और यह देख रहे हैं कि प्राकृतिक तरीके से उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल फसल उत्पादन में किस तरह किया जा सकता है।
कृषि छात्रों के लिए बना व्यावहारिक प्रयोग
बलिया के बांसडीह थाना क्षेत्र के राजागांव खरौनी गांव निवासी अभिषेक सिंह कृषि के छात्र हैं। उन्होंने बताया कि वह श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बलिया में कृषि की पढ़ाई कर रहे हैं। वह अन्य छात्रों के साथ निधरिया स्थित कृषि फार्म पर प्राकृतिक खेती का प्रयोग कर रहे हैं। छात्रों को यहां केवल किताबों के माध्यम से जानकारी नहीं दी जा रही, बल्कि उन्हें खेत में प्राकृतिक खेती की प्रक्रिया को प्रत्यक्ष रूप से समझाया जा रहा है। Prakritik Kheti Se Bhindi Ki Kheti का यह प्रयोग इसी व्यावहारिक शिक्षा का हिस्सा है।
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मित्र और शत्रु कीटों के बीच बना प्राकृतिक संतुलन
शस्य विज्ञान विशेषज्ञ डॉ. कौशल कुमार पांडेय के नेतृत्व में यह प्रयोग किया जा रहा है। उनके अनुसार, इस खेती में मित्र और शत्रु कीटों के बीच प्राकृतिक संतुलन देखने को मिल रहा है। हानिकारक कीटों को कई बार मित्र कीट अपना भोजन बना लेते हैं। इससे फसल में कीटों का दबाव कम रखने में प्राकृतिक रूप से मदद मिलती है। प्रयोग के दौरान पौधों में गंभीर बीमारी या रोग भी दिखाई नहीं दे रहा है। Prakritik Kheti Se Bhindi Ki Kheti
प्राकृतिक खेती में नहीं किया जा रहा रसायनों का इस्तेमाल
डॉ. कौशल कुमार पांडेय ने बताया कि कृषि फार्म पर छात्रों को प्राकृतिक खेती से जुड़ी जानकारी दी जा रही है। बीएससी तृतीय सेमेस्टर के पाठ्यक्रम में प्राकृतिक खेती भी शामिल है, इसलिए विद्यार्थियों को इसका व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। Prakritik Kheti Se Bhindi Ki Kheti के इस प्रयोग में रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। इसके बजाय खेत में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों और जैविक पदार्थों का उपयोग किया जा रहा है।
किसानों के लिए प्राकृतिक खेती का प्रयोग
बलिया में किया जा रहा यह प्रयोग प्राकृतिक खेती को समझने का एक अच्छा व्यावहारिक माध्यम बन रहा है। हालांकि किसी भी किसान को अपने खेत में इस पद्धति को अपनाने से पहले स्थानीय मिट्टी, मौसम, पानी की उपलब्धता और फसल की स्थिति को ध्यान में रखना चाहिए। Prakritik Kheti Se Bhindi Ki Kheti जैसे प्रयोगों से किसानों और कृषि छात्रों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके खेती को किस तरह आगे बढ़ाया जा सकता है। इस प्रयोग को भविष्य में अन्य फसलों तक भी विस्तार देने की योजना है।

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