छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले का पारंपरिक Chhattisgarh Jawanphool Chawal आज अपनी अनोखी खुशबू, स्वाद और बेहतरीन गुणवत्ता के कारण देशभर में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। कभी केवल स्थानीय बाजार तक सीमित रहने वाला यह सुगंधित चावल अब रायपुर, दिल्ली समेत कई बड़े शहरों तक पहुंच चुका है। बाजार में इसकी कीमत 175 से 180 रुपये प्रति किलो तक मिल रही है, जिससे किसानों की आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखने को मिल रही है।
पाकरगांव के किसानों ने बनाई नई पहचान
रायगढ़ जिले के लैलूंगा विकासखंड स्थित पाकरगांव के किसानों ने पारंपरिक धान की इस दुर्लभ किस्म को वर्षों से सुरक्षित रखा है। गांव के किसान सामूहिक रूप से Chhattisgarh Jawanphool Chawal की खेती कर रहे हैं और इसकी गुणवत्ता बनाए रखने पर विशेष ध्यान देते हैं। यही कारण है कि यह चावल आज प्रीमियम श्रेणी के उत्पाद के रूप में अपनी अलग पहचान बना चुका है।
10 एकड़ में सामूहिक खेती से बढ़ी किसानों की आमदनी
गांव के किसान निर्भय राम नायक, सेवक राम नायक, बूंद राम नायक, प्रदीप नायक और गणेश राम नायक लगभग 10 एकड़ क्षेत्र में मिलकर Chhattisgarh Jawanphool Chawal की खेती कर रहे हैं।किसानों का कहना है कि शुद्ध बीज, प्राकृतिक खेती और सही कृषि प्रबंधन की वजह से इस चावल की गुणवत्ता लगातार बनी हुई है। बेहतर गुणवत्ता के कारण उन्हें सामान्य धान की तुलना में कई गुना अधिक कीमत मिल रही है।
रायपुर से दिल्ली तक बढ़ रही मांग
आज Chhattisgarh Jawanphool Chawal की मांग केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है। रायपुर, दिल्ली सहित कई बड़े शहरों में इसकी नियमित सप्लाई की जा रही है। कई ग्राहक सीधे गांव पहुंचकर किसानों से चावल खरीदना पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें इसकी शुद्धता और प्राकृतिक स्वाद पर पूरा भरोसा है।
मुख्यमंत्री निवास तक पहुंच चुका है यह खास चावल
पाकरगांव के किसानों के लिए यह गर्व की बात है कि उनके खेतों में पैदा होने वाला Chhattisgarh Jawanphool Chawal मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के निवास तक भी पहुंच चुका है। इससे इस पारंपरिक धान की गुणवत्ता और लोकप्रियता का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
कम उत्पादन लेकिन शानदार मुनाफा
Chhattisgarh Jawanphool Chawal की खेती में सामान्य धान की तुलना में अधिक देखभाल की आवश्यकता होती है। किसानों के अनुसार प्रति एकड़ लगभग 12 से 15 क्विंटल उत्पादन प्राप्त होता है और मिलिंग के बाद करीब 60 प्रतिशत चावल निकलता है। हालांकि उत्पादन कम होता है, लेकिन ऊंची कीमत मिलने के कारण किसानों को अच्छा लाभ प्राप्त हो रहा है।
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हरी खाद से बढ़ रही गुणवत्ता और मिट्टी की उर्वरता
इस खरीफ सीजन में किसानों ने धान की रोपाई से पहले खेतों में ढैंचा की हरी खाद का उपयोग किया। इससे मिट्टी की जैविक उर्वरता बढ़ी और फसल को प्राकृतिक पोषण मिला। कृषि विभाग और ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों द्वारा किसानों को ढैंचा का बीज उपलब्ध कराया गया, जिससे खेती की लागत कम होने के साथ Chhattisgarh Jawanphool Chawal की गुणवत्ता भी बेहतर हुई।
पारंपरिक धान संरक्षण का सफल उदाहरण
पाकरगांव के किसानों की यह पहल केवल बेहतर आय तक सीमित नहीं है, बल्कि पारंपरिक धान की दुर्लभ किस्मों को संरक्षित करने का भी बेहतरीन उदाहरण बन गई है। कृषि विभाग किसानों को आधुनिक कृषि तकनीक, गुणवत्तापूर्ण बीज और वैज्ञानिक सलाह उपलब्ध करा रहा है। यदि इसी तरह उत्पादन, ब्रांडिंग और विपणन पर ध्यान दिया जाता रहा, तो Chhattisgarh Jawanphool Chawal आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की एक प्रमुख प्रीमियम कृषि पहचान बन सकता है।
