ICAR Ki 16 Nai Desi Pashudhan Naslein भारत में पशुधन की कई देसी नस्लें स्थानीय जलवायु, चारे और खेती-किसानी की परिस्थितियों के अनुसार विकसित हुई हैं। अब ऐसी ही ICAR Ki 16 Nai Desi Pashudhan Naslein को आधिकारिक पहचान मिली है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने गाय, भैंस, बकरी, भेड़, गधा, घोड़ा, सूअर और याक की 16 नई नस्लों को पंजीकृत किया है। इन नई नस्लों के जुड़ने के बाद देश में ICAR द्वारा पंजीकृत पशुधन नस्लों की संख्या बढ़कर 262 हो गई है। इनमें 258 देसी और 4 सिंथेटिक नस्लें शामिल हैं। नई पहचान से स्थानीय पशुधन नस्लों के संरक्षण और वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
13 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश की नस्लें शामिल
ICAR Ki 16 Nai Desi Pashudhan Naslein देश के अलग-अलग हिस्सों में पाई जाने वाली स्थानीय नस्लों से संबंधित हैं। इन नस्लों की पहचान कुल 13 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में की गई है। नस्लों के पंजीकरण की सिफारिश 7 अगस्त को नई दिल्ली में आयोजित नस्ल पंजीकरण समिति की 14वीं बैठक में की गई। इसका उद्देश्य देश में मौजूद स्थानीय पशुधन नस्लों की पहचान करना, उनका रिकॉर्ड तैयार करना और भविष्य में उनके संरक्षण को सुनिश्चित करना है। ICAR Ki 16 Nai Desi Pashudhan Naslein
गाय की चार नई नस्लों को मिली पहचान
नई पंजीकृत मवेशी नस्लों में कर्नाटक की कोप्पल, मध्य प्रदेश की महाकौशली, केरल की पेरियार और महाराष्ट्र की उमरदा नस्ल शामिल हैं। स्थानीय परिस्थितियों में विकसित इन नस्लों की आधिकारिक पहचान से इनके आनुवंशिक गुणों का रिकॉर्ड तैयार करने और भविष्य में वैज्ञानिक प्रजनन कार्यक्रमों को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है।
गोमंचली भैंस को भी मिला दर्जा
गोवा की गोमंचली भैंस को भी नई पंजीकृत नस्लों में शामिल किया गया है। स्थानीय स्तर पर पाई जाने वाली इस नस्ल को आधिकारिक पहचान मिलने से इसके संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन की संभावनाएं बढ़ेंगी। ICAR Ki 16 Nai Desi Pashudhan Naslein में शामिल अलग-अलग प्रजातियों की पहचान देश के विविध पशुधन संसाधनों को संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
बकरी की दो नई देसी नस्लें पंजीकृत
ICAR ने बकरी की दो नई नस्लों को भी आधिकारिक रूप से पंजीकृत किया है। इनमें राजस्थान और उत्तर प्रदेश की बत्तीसी तथा राजस्थान की तोतापुरी नस्ल शामिल हैं। राजस्थान जैसे गर्म और शुष्क क्षेत्र में स्थानीय पशु नस्लों का विशेष महत्व है। इन नस्लों का आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार होने से इनके संरक्षण और बेहतर प्रजनन की दिशा में काम करना आसान होगा।
भेड़ की चार नई नस्लों को मिली मान्यता
नई सूची में भेड़ की चार देसी नस्लें भी शामिल हैं। इनमें असम की असोमी, उत्तराखंड की कोव देबार, महाराष्ट्र और कर्नाटक की मडग्याल तथा बिहार की सीमांचली नस्ल शामिल है। इन नस्लों की पहचान से स्थानीय भेड़ पालन को बढ़ावा देने और नस्लों के विशेष गुणों पर वैज्ञानिक अध्ययन करने में मदद मिल सकती है।
गधा, घोड़ा, सूअर और याक भी सूची में शामिल
ICAR Ki 16 Nai Desi Pashudhan Naslein में केवल गाय, भैंस, बकरी और भेड़ ही नहीं, बल्कि अन्य पशु प्रजातियों को भी शामिल किया गया है। उत्तर प्रदेश की ब्रज गधा, जम्मू-कश्मीर की कश्मीरी घोड़ा, नगालैंड की नगाल सूअर और सिक्किम की सिक्किमी याक नस्ल को भी आधिकारिक पहचान मिली है।
ये भी देखे: 1056 लाख हेक्टेयर के पार पहुंचा रकबा, कई राज्यों में घटा धान का क्षेत्रफल
देसी पशुधन नस्लों की पहचान क्यों जरूरी है?
भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में पशुपालक पीढ़ियों से स्थानीय नस्लों का पालन करते आए हैं। इनमें गर्मी, ठंड, पहाड़ी इलाकों, स्थानीय चारे और अन्य भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलन की क्षमता विकसित हुई है। आधिकारिक पहचान मिलने के बाद इन नस्लों का वैज्ञानिक रिकॉर्ड तैयार करना आसान होगा। इससे इनके आनुवंशिक गुणों, उत्पादन क्षमता और स्थानीय उपयोगिता पर आगे शोध किया जा सकेगा।
पशुपालकों और रिसर्च को मिलेगा फायदा
करनाल स्थित ICAR-NBAGR पशुधन और पोल्ट्री नस्लों के पंजीकरण की नोडल संस्था है। नई नस्लों का आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार करने में इस संस्था की महत्वपूर्ण भूमिका है। नई नस्लों के पंजीकरण में पशुपालकों, प्रजनकों, राज्य पशुपालन विभागों, कृषि विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों का योगदान रहा है। ICAR Ki 16 Nai Desi Pashudhan Naslein की पहचान से भविष्य में बेहतर प्रजनन कार्यक्रम, रिसर्च और संरक्षण योजनाएं तैयार करने में मदद मिल सकती है।
देश में 262 हुई पंजीकृत पशुधन नस्लों की संख्या
16 नई नस्लों के पंजीकरण के बाद भारत में ICAR द्वारा पंजीकृत पशुधन नस्लों की कुल संख्या 262 हो गई है। इनमें 258 देसी और 4 सिंथेटिक नस्लें शामिल हैं। ICAR Ki 16 Nai Desi Pashudhan Naslein को आधिकारिक पहचान मिलना भारत के स्थानीय पशुधन संसाधनों के संरक्षण की दिशा में अहम कदम है। इससे देश की पारंपरिक पशु नस्लों का रिकॉर्ड मजबूत होगा और इनके संरक्षण, वैज्ञानिक उपयोग तथा विकास के नए अवसर पैदा होंगे।
