भारत में Paddy Farming के दौरान सबसे अधिक उपयोग होने वाली रासायनिक खाद यूरिया है। अधिक उत्पादन की चाह में कई किसान आवश्यकता से अधिक यूरिया का प्रयोग कर देते हैं, जिससे खेती की लागत बढ़ जाती है। लगातार अधिक यूरिया डालने से मिट्टी की उर्वरता प्रभावित होती है, लाभकारी सूक्ष्मजीव कम होने लगते हैं और पर्यावरण पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
इसी चुनौती का समाधान भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), पूसा के वैज्ञानिकों ने 4R तकनीक के रूप में प्रस्तुत किया है। यह वैज्ञानिक तरीका कम यूरिया में अधिक उत्पादन प्राप्त करने के साथ-साथ टिकाऊ Paddy Farming को बढ़ावा देता है।
Paddy Farming में क्या है 4R तकनीक?
4R तकनीक का अर्थ है फसल को सही मात्रा (Right Rate), सही समय (Right Time), सही स्रोत (Right Source) और सही तरीके (Right Method) से पोषक तत्व उपलब्ध कराना। इस तकनीक का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पौधों को केवल उतनी ही नाइट्रोजन मिले, जितनी वास्तव में आवश्यक हो।
इससे यूरिया की बर्बादी रुकती है, मिट्टी की गुणवत्ता बनी रहती है और Paddy Farming की लागत कम होती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाने से धान की उपज बेहतर होने के साथ खेत की उत्पादकता भी लंबे समय तक बनी रहती है।
ग्रीन सीकर से मिलेगी यूरिया की सही मात्रा
4R तकनीक का एक महत्वपूर्ण उपकरण ग्रीन सीकर है। यह आधुनिक सेंसर आधारित मशीन पौधों की हरियाली और नाइट्रोजन की स्थिति का विश्लेषण करके बताती है कि फसल को यूरिया की आवश्यकता है या नहीं। यदि पौधों में पर्याप्त नाइट्रोजन मौजूद है तो अतिरिक्त यूरिया डालने की जरूरत नहीं रहती। वैज्ञानिकों के अनुसार ग्रीन सीकर के उपयोग से लगभग 20 प्रतिशत तक नाइट्रोजन की बचत की जा सकती है। इससे Paddy Farming की लागत घटती है और किसानों का शुद्ध लाभ बढ़ता है।
क्लोरोफिल मीटर बताएगा कब डालें यूरिया
क्लोरोफिल मीटर पत्तियों में मौजूद क्लोरोफिल की मात्रा मापकर नाइट्रोजन की वास्तविक आवश्यकता का पता लगाता है। IARI के वैज्ञानिकों के अनुसार यदि धान की पत्तियों का औसत क्लोरोफिल मान 37.5 है तो प्रति हेक्टेयर लगभग 30 किलोग्राम नाइट्रोजन पर्याप्त रहती है। इस तकनीक की मदद से किसान अनुमान के बजाय वैज्ञानिक आधार पर यूरिया का प्रयोग कर सकते हैं। इससे Paddy Farming में अनावश्यक खाद डालने से बचाव होता है और प्रति हेक्टेयर लगभग 30 किलोग्राम तक नाइट्रोजन की बचत संभव होती है।
न्यूट्रीएंट एक्सपर्ट देगा खेत के अनुसार सलाह
वैज्ञानिकों ने न्यूट्रीएंट एक्सपर्ट नाम का डिजिटल सॉफ्टवेयर भी विकसित किया है, जो किसानों से खेत, मिट्टी और फसल की जानकारी लेकर पोषक तत्व प्रबंधन की सटीक सलाह देता है। यह तकनीक प्रत्येक खेत की अलग-अलग परिस्थितियों को ध्यान में रखकर खाद की मात्रा निर्धारित करती है। इससे खाद का संतुलित उपयोग होता है और Paddy Farming अधिक वैज्ञानिक तथा लाभदायक बनती है।
लीफ कलर चार्ट से खेत में ही करें जांच
लीफ कलर चार्ट (LCC) 4R तकनीक का सबसे सरल और कम लागत वाला उपकरण माना जाता है। यह एक प्लास्टिक की पट्टी होती है, जिसमें हल्के से गहरे हरे रंग की विभिन्न पट्टियां बनी होती हैं। किसान खेत में खड़ी फसल की पत्तियों का रंग चार्ट से मिलाकर आसानी से यह जान सकते हैं कि यूरिया डालने की आवश्यकता है या नहीं। इसके लिए सुबह 8 से 10 बजे के बीच कम से कम 10 स्वस्थ पौधों की पत्तियों का रंग मिलाना सबसे उपयुक्त माना जाता है। इस प्रक्रिया से Paddy Farming में जरूरत के अनुसार ही नाइट्रोजन का उपयोग किया जा सकता है।
धान की किस्म के अनुसार तय करें नाइट्रोजन की मात्रा
वैज्ञानिकों ने अलग-अलग प्रकार की धान की किस्मों के लिए अलग-अलग नाइट्रोजन की मात्रा निर्धारित की है। खरीफ के गैर-बासमती धान में यदि लीफ कलर चार्ट की वैल्यू 4 या उससे कम आती है तो प्रति हेक्टेयर 28 किलोग्राम नाइट्रोजन देना उचित माना जाता है।
बासमती धान और डायरेक्ट सीडेड गैर-बासमती धान में वैल्यू 3 या उससे कम होने पर लगभग 23 किलोग्राम नाइट्रोजन पर्याप्त रहती है। वहीं बोरो धान में वैल्यू 4 या उससे कम होने पर लगभग 35 किलोग्राम नाइट्रोजन देने की सलाह दी जाती है। इस प्रकार Paddy Farming में किस्म के अनुसार खाद प्रबंधन करने से उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार होता है।
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गेहूं की खेती में भी उपयोगी है 4R तकनीक
4R तकनीक केवल धान तक सीमित नहीं है। गेहूं की खेती में भी इसका उपयोग सफलतापूर्वक किया जा सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार बुवाई के समय कुल नाइट्रोजन का एक-तिहाई भाग तथा फॉस्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा देनी चाहिए। समय पर बोई गई फसल में पहली सिंचाई के समय लगभग 46 किलोग्राम नाइट्रोजन तथा देर से बोई गई फसल में लगभग 28 किलोग्राम नाइट्रोजन देने की सलाह दी जाती है।
शेष मात्रा लीफ कलर चार्ट के आधार पर तय की जा सकती है। यही वैज्ञानिक तरीका भविष्य की टिकाऊ Paddy Farming और अन्य फसलों के लिए भी उपयोगी साबित हो रहा है।
4R तकनीक से किसानों को क्या मिलेगा लाभ?
4R तकनीक अपनाने से यूरिया की खपत कम होती है, खेती की लागत घटती है और मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक सुरक्षित रहती है। संतुलित पोषण मिलने से पौधों की वृद्धि बेहतर होती है, फसल की गुणवत्ता बढ़ती है और उत्पादन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। साथ ही रासायनिक खादों का अनावश्यक उपयोग कम होने से पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलती है। यही कारण है कि कृषि वैज्ञानिक आने वाले समय में अधिक से अधिक किसानों को Paddy Farming में 4R तकनीक अपनाने की सलाह दे रहे हैं।
Paddy Farming में 4R तकनीक क्यों अपनानी चाहिए?
आज के समय में खेती की बढ़ती लागत और मिट्टी की घटती उर्वरता किसानों के सामने बड़ी चुनौती है। ऐसे में 4R तकनीक किसानों को कम यूरिया में अधिक उत्पादन देने का वैज्ञानिक और व्यावहारिक समाधान प्रदान करती है।
यदि किसान ग्रीन सीकर, क्लोरोफिल मीटर, न्यूट्रीएंट एक्सपर्ट और लीफ कलर चार्ट जैसे आधुनिक उपकरणों का उपयोग करें तो वे संतुलित पोषण प्रबंधन के माध्यम से बेहतर उत्पादन, कम लागत और अधिक मुनाफा प्राप्त कर सकते हैं। यही तकनीक भविष्य की टिकाऊ और लाभदायक Paddy Farming की मजबूत नींव बन सकती है।
