Urad Production: देश में मॉनसून की धीमी रफ्तार और किसानों का सोयाबीन जैसी अधिक लाभदायक वैकल्पिक फसलों की ओर बढ़ता रुझान उड़द उत्पादन पर भारी पड़ रहा है। 19 जून तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष की तुलना में उड़द की बुवाई का रकबा लगभग 40 फीसदी घट गया है। इसका सीधा असर उत्पादन पर भी देखने को मिल रहा है, जहां उड़द का अनुमानित उत्पादन 28 लाख टन से घटकर करीब 22 लाख टन रह गया है। Urad Production

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में बुवाई की रफ्तार में उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ, तो घरेलू उत्पादन और मांग के बीच का अंतर और बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में देश को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए रिकॉर्ड स्तर पर उड़द दाल का आयात करना पड़ सकता है, जिससे आयात पर निर्भरता बढ़ने के साथ-साथ घरेलू बाजार में दालों की कीमतों पर भी दबाव बनने की आशंका है। Urad Production
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देश में खरीफ सीजन के दौरान उड़द दाल का उत्पादन लगातार पांचवें वर्ष भी दबाव में रहने की आशंका है। कृषि क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि मॉनसून की धीमी शुरुआत, अनिश्चित मौसम और किसानों का सोयाबीन जैसी अधिक लाभदायक वैकल्पिक फसलों की ओर बढ़ता रुझान उड़द की बुवाई को प्रभावित कर रहा है। यही वजह है कि इस वर्ष भी उड़द का रकबा अपेक्षित स्तर तक नहीं बढ़ पाया है, जिससे उत्पादन में गिरावट और आयात पर निर्भरता बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। Urad Production
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 19 जून तक देश में उड़द की बुवाई का रकबा पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत कम दर्ज किया गया है।केडिया एडवाइजरी के रिसर्च प्रमुख अजय केडिया के अनुसार, उड़द उत्पादन में लगातार आ रही गिरावट के पीछे केवल मॉनसून में देरी ही नहीं, बल्कि किसानों को मिलने वाला सीमित आर्थिक लाभ भी एक बड़ा कारण है। उन्होंने हिन्दुस्तान टाइम्स से बातचीत में बताया कि उड़द की फसल नमी की कमी के प्रति बेहद संवेदनशील होती है। Urad Production

पिछले कुछ वर्षों में कमजोर और अनियमित मॉनसून, फसल की बढ़वार के दौरान लंबे सूखे की स्थिति तथा कटाई के समय बेमौसम बारिश जैसी मौसम संबंधी घटनाओं ने उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इसके चलते किसानों को बार-बार नुकसान उठाना पड़ा, जिससे कई किसान अब उड़द की बजाय सोयाबीन और अन्य अपेक्षाकृत सुरक्षित एवं लाभदायक फसलों की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं। Urad Production
2025-26 में उड़द उत्पादन घटकर करीब 22 लाख टन पर पहुंचा
उड़द की बुवाई में आई कमी का सीधा असर इसके उत्पादन पर भी देखने को मिल रहा है। सरकारी और उद्योग से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, देश में उड़द का उत्पादन फसल वर्ष 2021-22 के लगभग 28 लाख टन से घटकर 2025-26 में करीब 22 लाख टन रह गया है। यानी पिछले कुछ वर्षों में उत्पादन में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है, जिससे घरेलू आपूर्ति और मांग के बीच का अंतर बढ़ने की आशंका है। Urad Production
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले वर्षों में देश को उड़द की घरेलू जरूरत पूरी करने के लिए पहले से अधिक आयात करना पड़ सकता है। इससे आयात पर निर्भरता बढ़ने के साथ-साथ घरेलू बाजार में कीमतों पर भी दबाव देखने को मिल सकता है। Urad Production

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे देश के प्रमुख उड़द उत्पादक राज्यों में किसान तेजी से दूसरी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। ये तीनों राज्य मिलकर देश के कुल उड़द उत्पादन में लगभग 50 प्रतिशत का योगदान देते हैं, इसलिए यहां बुवाई में होने वाला कोई भी बदलाव राष्ट्रीय उत्पादन पर सीधा असर डालता है। Urad Production
केडिया एडवाइजरी के रिसर्च प्रमुख अजय केडिया के मुताबिक, किसान अब मक्का, सोयाबीन और मोटे अनाज (मिलेट्स) जैसी फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं। इन फसलों को मौसम के उतार-चढ़ाव के प्रति अपेक्षाकृत अधिक सहनशील माना जाता है और इनमें किसानों को अधिक स्थिर तथा बेहतर आय मिलने की संभावना रहती है। यही कारण है कि कई किसान धीरे-धीरे उड़द की खेती से दूरी बना रहे हैं। Urad Production
सोयाबीन की ओर बढ़ रहा किसानों का रुझान, उड़द की बुवाई पर पड़ रहा असर
इस खरीफ सीजन में सोयाबीन, उड़द की सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धी फसल बनकर उभरी है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे प्रमुख कृषि राज्यों में किसान तेजी से सोयाबीन की बुवाई कर रहे हैं, जिससे उड़द के रकबे में लगातार कमी देखने को मिल रही है। Urad Production
केएन एग्री रिसोर्सेज लिमिटेड के चेयरमैन जीके सूद के अनुसार, इन राज्यों में सोयाबीन की खेती का रकबा लगातार बढ़ रहा है। इसकी प्रमुख वजह बेहतर बाजार भाव और राज्य सरकारों की प्रोत्साहन योजनाएं हैं। उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश की भावांतर योजना और महाराष्ट्र की इसी तरह की सहायता योजनाओं से किसानों को सोयाबीन की खेती में अतिरिक्त आर्थिक सुरक्षा मिलती है, जिसके चलते वे उड़द की बजाय सोयाबीन को प्राथमिकता दे रहे हैं। Urad Production
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जीके सूद ने यह भी कहा कि सोयाबीन और उड़द, दोनों फसलों में लगभग समान मात्रा में सिंचाई की आवश्यकता होती है। ऐसे में जब सोयाबीन बेहतर कीमत, सरकारी समर्थन और अपेक्षाकृत अधिक स्थिर आय का विकल्प उपलब्ध कराती है, तो किसानों का उसकी ओर आकर्षित होना स्वाभाविक है। यही कारण है कि इस खरीफ सीजन में कई इलाकों में उड़द की जगह बड़े पैमाने पर सोयाबीन की बुवाई की जा रही है, जिसका असर दलहन उत्पादन पर भी पड़ सकता है। Urad Production
घरेलू उत्पादन घटने से 72 प्रतिशत बढ़ा उड़द का आयात
भारत की कृषि व्यवस्था आज भी काफी हद तक मॉनसून पर निर्भर है। देश के लगभग 52 प्रतिशत खेती योग्य क्षेत्र में सिंचाई का प्रमुख स्रोत बारिश है, जबकि करीब एक-चौथाई कृषि भूमि ऐसी है जहां सिंचाई की कोई स्थायी व्यवस्था उपलब्ध नहीं है। ऐसे में मॉनसून की समय पर और पर्याप्त बारिश खरीफ फसलों, विशेषकर दलहनों के उत्पादन के लिए बेहद अहम मानी जाती है।
हालांकि इस वर्ष मॉनसून की धीमी शुरुआत ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। 26 जून तक देश में सामान्य से करीब 42 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई, जिसके कारण कई राज्यों में खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द ही बारिश में सुधार नहीं हुआ, तो उड़द सहित अन्य दलहनी फसलों के उत्पादन पर इसका और अधिक असर पड़ सकता है। Urad Production
घरेलू उत्पादन में लगातार आ रही कमी का असर आयात पर भी साफ दिखाई दे रहा है। देश में मांग और आपूर्ति के बीच बढ़ते अंतर को पूरा करने के लिए उड़द दाल का आयात तेजी से बढ़ा है। पिछले चार वर्षों में उड़द का आयात लगभग 72 प्रतिशत बढ़ चुका है। वित्त वर्ष 2022-23 में भारत ने करीब 6.11 लाख टन उड़द का आयात किया था, जो बढ़कर 2025-26 में लगभग 10.5 लाख टन तक पहुंच गया। यदि उत्पादन में गिरावट का मौजूदा रुझान जारी रहता है, तो आने वाले वर्षों में आयात पर निर्भरता और अधिक बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
2026-27 में उड़द आयात नया रिकॉर्ड बना सकता है
घरेलू उत्पादन में लगातार आ रही गिरावट के बीच विशेषज्ञों ने अगले वित्त वर्ष के लिए भी चिंता जताई है। कृषि जिंस अनुसंधान संस्था आईग्रेन इंडिया के संस्थापक राहुल चौहान का मानना है कि यदि बुवाई और उत्पादन में मौजूदा रुझान जारी रहता है, तो वर्ष 2026-27 में भी भारत का उड़द आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकता है।
राहुल चौहान के अनुमान के अनुसार, अगले वित्त वर्ष में देश को अपनी घरेलू मांग पूरी करने के लिए लगभग 11 से 12 लाख टन या उससे भी अधिक उड़द का आयात करना पड़ सकता है। उनका कहना है कि लगातार घटता उत्पादन, सीमित बुवाई क्षेत्र और बढ़ती खपत के कारण मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है, जिसकी भरपाई आयात के जरिए करनी पड़ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मॉनसून सामान्य नहीं रहा और किसान बड़े पैमाने पर वैकल्पिक फसलों की ओर रुख करते रहे, तो आने वाले वर्षों में उड़द के मामले में देश की आयात पर निर्भरता और अधिक बढ़ सकती है। इससे घरेलू बाजार में कीमतों और दालों की उपलब्धता पर भी असर पड़ने की आशंका बनी हुई है।
निष्कर्ष
कमजोर मॉनसून, उड़द की घटती बुवाई और किसानों का सोयाबीन जैसी अधिक लाभदायक फसलों की ओर बढ़ता रुझान देश में उड़द उत्पादन के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। यदि आने वाले दिनों में बारिश सामान्य नहीं हुई और बुवाई में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हुई, तो घरेलू उत्पादन और मांग के बीच का अंतर और बढ़ सकता है।
ऐसी स्थिति में भारत को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए रिकॉर्ड स्तर पर उड़द दाल का आयात करना पड़ सकता है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि उत्पादन बढ़ाने के लिए किसानों को बेहतर मूल्य, सरकारी प्रोत्साहन और मौसम के अनुकूल कृषि तकनीकों का लाभ पहुंचाना आवश्यक होगा, ताकि देश की आयात पर निर्भरता कम की जा सके और दलहन उत्पादन को मजबूत आधार मिल सके।
