HS Vaccine: जुलाई से अक्टूबर का समय पशुओं में संक्रामक बीमारियों के फैलने के लिहाज से सबसे संवेदनशील माना जाता है। इस दौरान नमी और मौसम में बदलाव के कारण गलघोंटू (HS) और लंगड़ी बुखार (BQ) जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है। ऐसे में पशुपालकों को अपने पशुओं की नियमित साफ-सफाई, संतुलित आहार, स्वच्छ पेयजल और उचित देखभाल पर विशेष ध्यान देना चाहिए। साथ ही, पशुओं का समय पर टीकाकरण कराना सबसे प्रभावी बचाव उपाय है। HS Vaccine

यदि किसी पशु में तेज बुखार, गर्दन या गले में सूजन, चलने में परेशानी, लंगड़ापन, भूख कम लगना या सुस्ती जैसे शुरुआती लक्षण दिखाई दें, तो इसे नजरअंदाज न करें। तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सक से संपर्क कर जांच और उपचार शुरू कराना आवश्यक है। समय रहते इलाज और सावधानी बरतने से न केवल पशुओं की जान बचाई जा सकती है, बल्कि पशुपालकों को होने वाले आर्थिक नुकसान से भी काफी हद तक बचाव संभव है। HS Vaccine
HS Vaccine
बरसात का मौसम खेती के लिए जितना लाभदायक होता है, पशुपालकों के लिए उतना ही चुनौतीपूर्ण भी साबित हो सकता है। जुलाई से अक्टूबर के बीच वातावरण में बढ़ी नमी, कीचड़, गंदगी और तापमान में उतार-चढ़ाव के कारण पशुओं में संक्रामक रोग तेजी से फैलने लगते हैं। HS Vaccine
इस दौरान यदि पशुओं की उचित देखभाल, साफ-सफाई और समय पर टीकाकरण नहीं कराया जाए, तो गलघोंटू (HS) और लंगड़ी बुखार (BQ) जैसी गंभीर बीमारियां पूरे पशुधन को अपनी चपेट में ले सकती हैं। इससे न केवल पशुओं की मृत्यु का खतरा बढ़ता है, बल्कि दूध उत्पादन में कमी और इलाज पर होने वाले खर्च के कारण पशुपालकों को भारी आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। HS Vaccine

पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम (KVK Noida) के अनुसार, मानसून के दौरान गलघोंटू और लंगड़ी बुखार के मामले सबसे अधिक सामने आते हैं। इसलिए पशुपालकों को इन बीमारियों के शुरुआती लक्षणों की पहचान, समय पर टीकाकरण और आवश्यक बचाव उपायों की पूरी जानकारी होना बेहद जरूरी है। थोड़ी-सी सतर्कता और समय पर उपचार से पशुओं को गंभीर संक्रमण से बचाया जा सकता है तथा पशुधन को स्वस्थ और सुरक्षित रखा जा सकता है। HS Vaccine
क्यों बढ़ जाता है बीमारियों का खतरा?
बरसात के मौसम में पशु बाड़ों में नमी, कीचड़ और गंदगी तेजी से बढ़ जाती है, जिससे रोग फैलाने वाले बैक्टीरिया, वायरस और अन्य सूक्ष्मजीवों के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण बन जाता है। यदि पशुशाला की नियमित सफाई और जल निकासी की उचित व्यवस्था न हो, तो संक्रमण फैलने की आशंका कई गुना बढ़ जाती है। HS Vaccine
इसके अलावा, मानसून के दौरान मच्छर, मक्खी, किलनी (टिक) और अन्य परजीवियों की संख्या भी तेजी से बढ़ती है। ये परजीवी पशुओं का खून चूसने के साथ-साथ कई संक्रामक रोगों के वाहक (Carrier) के रूप में भी काम करते हैं और संक्रमण को एक पशु से दूसरे पशु तक आसानी से पहुंचा सकते हैं। HS Vaccine
यही कारण है कि जुलाई से अक्टूबर के बीच गलघोंटू (HS), लंगड़ी बुखार (BQ) समेत कई अन्य संक्रामक बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है। इसलिए इस मौसम में पशुपालकों को पशुशाला की स्वच्छता, नियमित कीट नियंत्रण और समय पर टीकाकरण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। HS Vaccine

गलघोंटू (HS) रोग के लक्षण
गलघोंटू (हेमोरेजिक सेप्टीसीमिया) पशुओं में होने वाली एक अत्यंत संक्रामक और जानलेवा जीवाणुजनित बीमारी है, जो विशेष रूप से बरसात के मौसम में तेजी से फैलती है। यह रोग मुख्य रूप से गाय और भैंसों को प्रभावित करता है। संक्रमित पशु को अचानक तेज बुखार आता है, जो 106 से 107 डिग्री फारेनहाइट तक पहुंच सकता है। यदि समय पर उपचार न मिले, तो कुछ ही समय में पशु की हालत गंभीर हो सकती है। HS Vaccine
गलघोंटू रोग के प्रमुख लक्षण:
- अचानक तेज बुखार आना।
- गले, गर्दन और छाती के आसपास सूजन दिखाई देना।
- सांस लेने में कठिनाई और तेज सांस चलना।
- सांस लेते समय घरघराहट या असामान्य आवाज आना।
- मुंह से अत्यधिक लार टपकना।
- आंखों का लाल होना और सुस्ती महसूस होना।
- चारा-पानी छोड़ देना तथा कमजोरी बढ़ना।
- गंभीर स्थिति में पशु का अचानक गिर जाना और समय पर इलाज न मिलने पर मृत्यु हो जाना।
इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई देने पर देरी न करें। संक्रमित पशु को अन्य पशुओं से अलग रखें और तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सक से संपर्क कर उपचार शुरू कराएं। समय पर इलाज और उचित देखभाल से बीमारी से होने वाले नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है। HS Vaccine
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लंगड़ी बुखार (BQ) की पहचान कैसे करें?
लंगड़ी बुखार (ब्लैक क्वार्टर/Black Quarter) एक गंभीर जीवाणुजनित संक्रामक बीमारी है, जो मुख्य रूप से 6 महीने से 2 वर्ष की आयु वाले स्वस्थ और अच्छी बढ़वार वाले पशुओं में अधिक देखी जाती है। यह रोग विशेष रूप से बरसात के मौसम में तेजी से फैलता है और समय पर उपचार न मिलने पर जानलेवा साबित हो सकता है। HS Vaccine
लंगड़ी बुखार के प्रमुख लक्षण:
- अचानक तेज बुखार आना।
- एक या अधिक पैरों में लंगड़ापन दिखाई देना।
- जांघ, कंधे या शरीर की मांसपेशियों में दर्दयुक्त सूजन होना।
- सूजन वाली जगह को दबाने पर गैस बनने के कारण चरमराहट (क्रैकलिंग) जैसी आवाज आना।
- पशु का चलने-फिरने में कठिनाई महसूस करना या उठने में परेशानी होना।
- चारा-पानी कम खाना, सुस्ती और कमजोरी बढ़ना।
- गंभीर स्थिति में पशु का अचानक गिर जाना और समय पर इलाज न मिलने पर मृत्यु हो जाना।
यदि किसी पशु में ये लक्षण दिखाई दें, तो उसे तुरंत अन्य पशुओं से अलग रखें और बिना देरी किए नजदीकी पशु चिकित्सक से संपर्क करें। समय पर उपचार और नियमित टीकाकरण ही इस बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है। HS Vaccine
बीमारी का दूध उत्पादन पर भी पड़ता है असर
संक्रामक बीमारियों का प्रभाव केवल पशु के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा असर दूध उत्पादन और पशुपालकों की आय पर भी पड़ता है। जब कोई पशु बीमार होता है, तो उसकी भूख कम हो जाती है, शरीर कमजोर पड़ने लगता है और दूध देने की क्षमता में उल्लेखनीय गिरावट आ सकती है। कई बार पशु चारा-पानी कम खाने लगता है या पूरी तरह छोड़ देता है, जो किसी गंभीर बीमारी का शुरुआती संकेत हो सकता है। इसलिए पशुपालकों को पशुओं के खानपान, व्यवहार और दूध उत्पादन में होने वाले किसी भी बदलाव पर नियमित नजर रखनी चाहिए।
समय पर टीकाकरण ही सबसे प्रभावी बचाव
गलघोंटू (HS), लंगड़ी बुखार (BQ) और खुरपका-मुंहपका (FMD) जैसी संक्रामक बीमारियों से बचाव के लिए समय पर टीकाकरण कराना बेहद जरूरी है। हालांकि केवल टीका लगवाना ही पर्याप्त नहीं है। पशुशाला की नियमित साफ-सफाई, स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था, संतुलित आहार, परजीवी नियंत्रण और पशु चिकित्सक की सलाह का पालन करना भी उतना ही आवश्यक है।
यदि पशुपालक बीमारी के शुरुआती लक्षणों की समय पर पहचान कर लें, संक्रमित पशु को अलग रखें और तुरंत पशु चिकित्सक से उपचार शुरू कराएं, तो गंभीर नुकसान से बचा जा सकता है। नियमित टीकाकरण और उचित देखभाल अपनाकर पशुधन को स्वस्थ रखा जा सकता है, जिससे दूध उत्पादन बेहतर बना रहता है और पशुपालकों की आय भी सुरक्षित रहती है।
